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गर्मियों में सर्दियाँ

देखने में आ रही है गर्मियों में सर्दियाँ 

मौसमों की दोस्ती हैं गर्मियों में सर्दियाँ 

आम पर खामोश बैठी,झुरमटों से देखती 

कोयलें कुछ सोचती हैं गर्मियों में सर्दियाँ 

आओ चिंता सब  करें अपने किसानों के लिये 

क्यों फसल को लूटती हैं गर्मियों में सर्दिया  

बादलों के साथ ओले ले, हवायें आ गई 

देखो कितनी साहसी है गर्मियों में सर्दिया।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by सूबे सिंह सुजान on June 13, 2015 at 7:57pm
कृष्ण मिश्रा,जी आभार
Comment by सूबे सिंह सुजान on June 13, 2015 at 7:56pm
गोपाल नारायण जी,नमस्कार,बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 19, 2015 at 8:10pm

वाह!मुझे  गज़ल बहुत पसंद आई! बधाई आदरणीय सुजान जी!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 18, 2015 at 12:47pm

आ० सुजान जी

बेहतरीन  गजल . सादर ,.

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