For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल- बदलने को बदल जाना,मगर तहजीब जिंदा रख।

बदलने को बदल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख
हवा के साथ ढल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख
यहाँ रंगीन होती रोशनी है कौंधने वाली
खुशी के साथ जल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख
हमारे आम पर यह कूकती कोयल बताती है
नये मौसम मचल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख
हमारे नौजवानों की नई पीढी, नये रिश्ते
नशे में खुद को छल जाना मगर तहजीब जिंदा रख
महब्बत के लिये तो लाख पापड बेलने होंगे
महब्बत में उछल जाना मगर तहजीब जिंदा रख
बदलना भी जमाने का बडा हैरान करता है
बहुत आगे निकल जाना मगर तहजीब जिंदा रख
भटक कर आदमी इनसानियत को प्यार करता है
कंही खुद को न छल जाना मगर तहजीब जिंदा रख
...........................सूबे सिंह सुजान.......................
मौलिक तथा अप्रकाशित

Views: 540

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 8:50pm

Dr. Vijai Shanker,   जी आपकी टिप्पणी पाकर मुझे खुशी हुई। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 8:49pm

Samar kabeer,      जी आपने तारीफ की । मैं अभिभूत हूँ। परंतु मुझसे भी अवश्य ही दोष हुआ है । यह दोष पता चलने पर मुझे बहुत हैरत हुई कि मैं कैसे गलती कर गया। गिरिराज जी  ने मुझे याद दिलाया मैं उनका और आपका बहुत बहुत आभारी हूँ।

Comment by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 8:46pm

गिरिराज भंडारी

                    जी आपका बहुत बहुत आभार। आपने ठीक याद दिलाया।

मानता हूँ यह तो दोष है। बहुत जल्दबाजी कर गया । इस दोष पर आप सब प्रबुद्धजनों से क्षमा प्रार्थी हूँ।

Comment by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 8:43pm
Comment by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 8:43pm

Shyam Narain Verma

  आपका आभार

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 16, 2015 at 4:34pm
अच्छी ग़ज़ल , बधाई , आदरणीय सूबे सिंह सुजान जी , सादर।
Comment by Samar kabeer on April 16, 2015 at 2:55pm
जनाब सूबे सिंह सुजान जी,आदाब,आपकी रचना अच्छा संदेश दे रही है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
मैं जनाब गिरिराज भंडारी जी की बात से सहमत हूँ |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 16, 2015 at 2:06pm

आदरणीय सूबे सिंह भाई जी , गज़ल बहुत सुन्दर हुई है , बहुत कठिन रदीफ का आपने निर्वाह किया है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

मतले मे काफिया में सिनाद दोष आ गया है  --  बदल जाना .... और घुल जाना ....  समान हिस्से  - ल जाना  के पहले का स्वर मेल भी होना आवश्यक है ,  बदल मे  अल और घुल मे उल आ रहा है , देख लीजियेगा ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 12:55pm

आ० सुजान जी

अच्छी गजल हुयी है  . सादर .

Comment by Shyam Narain Verma on April 16, 2015 at 10:52am
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service