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गजल ,वो मुझे एकटक देखती रह गई

हाथ पर उसके ठोडी टिकी रह गई
वो मुझे एकटक देखती रह गई

वो हवा हो गई एक पल में कंही
मुस्कुराहट यहाँ गूँजती रह गई

मंजिलों की तरफ दौड़ते -दौड़ते,
जिंदगी कट गई बेबसी रह गई

आपकी याद जिंदा जलाई मगर,
आँधियाँ फिर चलीं,अधजली रह गई

सच का सूरज उजाला बहुत भर गया,
रात आईं मगर रोशनी रह गई

सूबे सिंह सुजान
मौलिक व प्रकाशित

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Comment by सूबे सिंह सुजान on March 20, 2015 at 5:44pm
gumnaam,ji धन्यवाद
Comment by Hari Prakash Dubey on March 18, 2015 at 9:07pm

आदरणीय सूबे सिंह सूजान जी, इस सुन्दर रचना पर बधाई प्रेषित ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 18, 2015 at 8:25pm

आदरणीय सूबे सिंह जी सुन्दर ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई 

आदरणीय गिरिराज सर की सलाह अच्छी है उससे मैं भी सहमत हूँ.

एक निवेदन है ग़ज़ल की बह्र का वज्न 212x4 अवश्य लिख दे 

Comment by somesh kumar on March 18, 2015 at 7:00pm

मंजिलों की तरफ दौड़ते -दौड़ते,
जिंदगी कट गई बेबसी रह गई

सुंदर शे'रों के जरिए कुछ सम्वेदनाओं और कुछ जीवन-सत्यों को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया आप ने ,बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 18, 2015 at 5:48pm

आदरनीय सूबे सिंह भाई , बहुर सुन्दर गज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ॥

वो हवा हो गई एक पल में कंही
मुस्कुराहट यहाँ गूँजती रह गई      ---- इस शे र में ,मुस्कुराहट की जगह  खिलखिलाहट  क्या अच्छा नहीं रहेगा ? क्योंकि आगे बात गूंजने की हो रही है ॥

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 18, 2015 at 5:41pm

सुंदर रचना के लिए बधाई ...........................

Comment by सूबे सिंह सुजान on March 18, 2015 at 1:22pm
Shyam mathpal,जी आपका स्वागत है,बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by सूबे सिंह सुजान on March 18, 2015 at 1:21pm
आदरणीय विजयी शंकर जी,आपकी मेहरबानी है,बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by सूबे सिंह सुजान on March 18, 2015 at 1:19pm
Shyam narayan sharma,जी आपकी जरर्रानवाजी है,धन्यवाद
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 18, 2015 at 12:23pm


 वो हवा हो गई एक पल में कंही
मुस्कुराहट यहाँ गूँजती रह गई

मंजिलों की तरफ दौड़ते -दौड़ते,
जिंदगी कट गई बेबसी रह गई------------------सुन्दर रचना  आ० सुजान जी .

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