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खारे पानी में भी मिठास होती है .....

दर्द के दरिया में सब कुछ खारा है
तुम ना जानो ...
क्यूंकि ये दर्द तो हमारा है
वो जो परिंदा इसमें डूबा है
इसे तुमने ही वहां उतारा है !

मगर समंदर के खारे पानी में
मछलियाँ ख़ुशी से तैर रही हैं
एक दूजे से खेल रही हैं
दुखी नज़र नहीं आतीं वो
यहाँ से निकलने का कोई
उतावलापन भी नहीं दिखता उन्हें
और अगले पल की फिक्र भी नहीं !

मैं भी तो मछली बन सकता हूँ
मुठ्ठी ढीली छोड़
ग़मों को आज़ाद कर सकता हूँ
और पकड़ सकता हूँ
कुछ छोटी छोटी खुशियाँ
और जी सकता हूँ
इस दर्द के समंदर में
एक मछली की तरहां
सीख ले 'इंतज़ार' इन मछलिओं से
खारे पानी में भी मिठास होती है !!

************************************************

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on May 3, 2015 at 4:52pm
बहुत खूब , विचारों को बहुत दूर तक ले गए आप, आदरणीय मोहन सेठी जी, हर जीव अपने परिवेश में खुश और सलामत रहता है,मछलियाँ खुली हवा में नहीं रह सकती। बहुत बहुत बधाई इस सारगर्भित प्रस्तुति के लिए , सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2015 at 2:51pm

वाह ..एक नया एंगल दिया है ..शायद हमसे उन्नत स्पीशीज अंतरिक्ष से हमें देख के यही सोचती होगी कि ऑक्सीजन में कैसे कोई खेल सकता है ..शायद इसीलिए हर धर्म में  इस दुनियाँ के पार किसी बेहतर दुनिया का ज़िक्र है ..
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है 
सादर 

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