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“सुन री छोटी ! सीख कुछ मुझसे. जब देखो मुंह उघारे घूमती रहे है, घूँघट काढ़ा कर |” “ना जीजी हम नही बन सके तुम्हारे जैसे पर्देदार ! देखी हैं हम तुम्हारी नजर.. घूँघट के पीछे से घूरे है छुटके देवर जी का शरीर जब देखो तब |” “का फायदा ऐसे घूँघट का..?” देवरानी ने पलट जवाब दे मारा जेठानी पर |

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sudhir Dwivedi on May 27, 2015 at 9:28am

आदरणीय सौरभ जी प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 27, 2015 at 12:12am

पर्दे के पीछे पर्दानशीं है.. . यह पर्दानशीं कई क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं का कारण हुआ करती है.

हार्दिक बधाइयाँ इस ऑब्जर्वेशन के लिए ..

सादर

Comment by Sudhir Dwivedi on May 17, 2015 at 3:08pm

शुक्रिया नेहा जी , मैं भी गौरवान्वित हूँ आपकी प्रतिक्रिया से ..

Comment by Sudhir Dwivedi on May 17, 2015 at 3:07pm

आ. श्याम नारायण वर्मा जी हार्दिक आभार 

Comment by Sudhir Dwivedi on May 17, 2015 at 3:07pm

आ. हरिप्रकाश दुबे जी हार्दिक धन्यवाद 

Comment by Shyam Narain Verma on May 16, 2015 at 11:35am
बहुत सुन्दर !! लघुकथा के लिये बधाइयाँ ॥
Comment by Hari Prakash Dubey on May 15, 2015 at 10:18pm

सुन्दर  रचना  आ. Sudhir Dwivedi जी , "देखी हैं हम तुम्हारी नजर.. घूँघट के पीछे से घूरे है छुटके देवर जी का शरीर जब देखो तब |" ये  पंक्तियाँ  कमाल  करती है ! बधाई आपको 

Comment by neha agarwal on May 15, 2015 at 4:12pm
वाह भाई गर्व है मुझे की आप मेरे भाई हो।
Comment by Sudhir Dwivedi on May 15, 2015 at 11:29am

आ. मिथिलेश जी , आभार | सादर 

Comment by Sudhir Dwivedi on May 15, 2015 at 11:22am

आदरणीय जीतेन्द्र  जी .. हार्दिक धन्यवाद  

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