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देशभक्ति (लघुकथा)

"अरे इस बॉल पे तो चार रन बन जाते पर सब तो पेप्सी के एड से ही कमाते है..। देश जाए भाड़ में." रेस्टोरेंट में टी वी देखते हुए स्वदेश ने ज्यूँ ही बिल देखा।"अरे ये १४० रूपये टैक्स के क्यों जोड़ दिए कच्चा बिल ही बना देते।"

"पर बाबू जी इसी टैक्स से तो देश चले है। चुप कर जानता है कौन हूँ मैं ?" "सेल्स टैक्स की रेड पड़वा दी तो भूल जाएगा ये देशभक्ति।"

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Sudhir Dwivedi on April 28, 2015 at 2:10pm

इस तरह के उपदेश देने की परम्परा रही है समाज में ... आभार जीतेन्द्र पस्तारिया जी 

सादर 

Comment by Sudhir Dwivedi on April 28, 2015 at 2:09pm

आभार डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी !!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:53am

बस! यही हो रहा है आजकल. एक-दुसरे को फर्ज दिखाने की नौटंकी. बधाई आदरणीय सुधीर जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 27, 2015 at 8:04pm

वाह जी  , बहुत खूब , बधाई हो.

Comment by Sudhir Dwivedi on April 27, 2015 at 4:01pm

आभार नेहा जी 

सादर 

Comment by Sudhir Dwivedi on April 27, 2015 at 4:00pm

आभार मिथिलेश जी 

सादर 

Comment by neha agarwal on April 27, 2015 at 2:24pm
बहुत खूब

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 27, 2015 at 1:20pm

रेट की टंकण त्रुटी सही हो गई रेड 

बधाई इस प्रस्तुति पर 

Comment by Sudhir Dwivedi on April 25, 2015 at 9:45am
धन्यवाद Dr Vijai Shanker Ji
सुधार किये देता हूँ

सादर
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 24, 2015 at 5:22pm
"सेल्स टैक्स की रेट पड़वा दी तो भूल जाएगा ये देशभक्ति।" में रेड शब्द आयेगा.
लघु-कथा अच्छी है। बधाई।

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