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कोशिश______मनोज कुमार अहसास

122 122 122 122




हक़ीक़त नहीं मैं धुँआ चाहता हूँ
तिरी ओर से बस दगा चाहता हूँ

तु मुझको सफ़र में कही छोड़ देना
फकत दो कदम को सना चाहता हूँ

जहाँ तक मुझे तोड़ देगा ज़माना
वहीँ तक सदा की हवा चाहता हूँ

नहीं साथ तेरा अगर ज़िन्दगी में
तिरी रहगुजर में कज़ा चाहता हूँ

ज़रा तोड़कर ये परत बेबसी की
कहीं दूर अब मै उड़ा चाहता हूँ

फ़क़ीरी मेरी वो कदम से लगा लें
अमीरी का उनकी नशा चाहता हूँ

बहुत मुश्किलों में कटी रात कातिल
चिराग-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on June 16, 2015 at 1:43am

बहुत खूब

Comment by मनोज अहसास on May 28, 2015 at 6:37am
शुक्रिया सर
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 2:45am

अपनी सोच को बहर में साधने केलिए आप उद्यत हुए यह बहुत बड़ी बात है. ग़ज़लों की दुनिया में आपका स्वागत है !

सतत प्रयासरत रहें.

शुभेच्छाएँ

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