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अचानक भड़का दंगा और ऑटो की पिछली सीट पर बैठी बेहद भयभीत युवती । दूर - दूर तक कोई सूरत नहीं बच निकलने की ।अजीब सी कशमकश थी ऑटो छोड़ भागूँ या युवती की मदद करूँ ? जो कि कहीं से भी संभव नहीं दिख रही थी ।लोग और पास , और पास आते जा रहे थे ।सहसा लड़की ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया । उसकी आँखों में मृत्यु का उतना डर नहीं था जितना अपनी होने वाली दुर्गति का ।बस सिर्फ एक पल था मेरे पास निर्णय लेने को , और उस एक पल में ही मैंने माचिस की तीली सुलगा दी ।ऑटो धू-धू कर जलने लगा । ऊपर उठती लपटें राहत महसूस कर रही थीं , उसने एक आबरू बचा ली थी , बिना मज़हब को जाने ।
मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by shashi bansal goyal on June 22, 2015 at 4:23pm
हार्दिक आभार एवं धन्यवाद आद0 आदित्य कुमार जी ।
Comment by Aditya Kumar on June 22, 2015 at 4:21pm

मानवता ही धर्म है ऐसा सन्देश देती हुई  लघु कथा / संस्मरण। बधाई स्वीकार करें 

Comment by shashi bansal goyal on June 22, 2015 at 4:16pm
आद0 कांता जी मुझे प्रसन्नता है आपका सहयोग , मार्गदर्शन और प्रोत्साहन सदा मिलता रहता है ।सादर धन्यवाद एवं आभार ।
Comment by shashi bansal goyal on June 22, 2015 at 4:13pm
आद0 राजेश जी आपकी ये प्रतिक्रिया मेरे लिए कितनी अनमोल साबित हुई बता नहीं सकती । क्योंकि इस दृष्टिकोण से तो मैंने सोचा ही नहीं था ।मैं दिल से आभारी और कृतज्ञ हूँ । सादर ।
Comment by shashi bansal goyal on June 22, 2015 at 4:09pm
हार्दिक आभार एवं धन्यवाद आद0 गोपाल नारायण जी । आपका सहयोग प्रतिक्रिया के रूप में सदा मिलता है जिससे बहुत प्रसन्नता होती है ।सादर ।
Comment by kanta roy on June 22, 2015 at 10:07am
चंद शब्दों में बहुत भाव उकेरे है आपने आदरणीया शशि बंसल जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 21, 2015 at 10:36am

अन्दर तक सिहरन दौड़ गई इस द्रश्य को पढ़कर किन्तु लघु कथा से ज्यादा मुझे ये एक संस्मरण लगा ,खैर  जो भी है इसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई शशि बंसल जी .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 20, 2015 at 1:26pm

सन्देश तो मुखर है पर कई सवाल भी  उठ खड़े होते हैं . सादर .

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