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ग़ज़ल- हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।
बडी जालिम है' पलकों पर मे'री बादल बनाती है।

निगाहे गर्म वो उसकी मसीहा भी है' कातिल भी।
कभी मरहम लगाती है कभी घायल बनाती है।

महकता है चमन सारा तुम्हारे तन की' खुशबू से।
तुम्हारी ही नकल से शाखे गुल कोंपल बनाती है।

जहाँ सहरा बनाया है खुदा तेरे फरिश्तों ने।
वहाँ उस शख़्स की मौजूदगी जंगल बनाती है।

हवा तेरा बदन छूकर अगर छू ले किसी को फिर।
ते'रा आशिक बनाती है ते'रा कायल बनाती है।

मुझे सुनने में' आया हैं ते'री जाने जिगर 'राहुल'।
तुझे उल्फत नहीं करती फकत पागल बनाती है।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by Rahul Dangi Panchal on July 26, 2015 at 12:07am
आदरणीया कान्ता रॉय जी बहुत बहुत आभार
Comment by kanta roy on July 25, 2015 at 4:39pm
हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।
बडी जालिम है' पलकों पर मे'री बादल बनाती है........ वाह ! वाह ! क्या काजल बनाती है ..... बहुत ही लाजवाब लगी गजल आपकी । बधाई आदरणीय राहुल दाँगी जी
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 25, 2015 at 11:04am
आदरणीय धर्मेन्द्र जी आप जैसे बडे रचनाकार के मुँह से वाह सुनकर रचना सफल हुई । सादर धन्यवाद
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 24, 2015 at 11:57am
वाह वाह, आदरणीय राहुल जी, दाद कुबूल करें
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 23, 2015 at 2:51pm
आदरणीय गिरिराज सर शुक्रिया
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 23, 2015 at 2:51pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी शुक्रिया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 23, 2015 at 12:45pm

अच्छी गज़ल हुई है , आ. राहुल भाई आपको हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 23, 2015 at 10:59am

बहुत सुन्दर प्यारी ग़ज़ल हुई है राहुल जी दिल से बधाई लीजिये 

हवा तेरा बदन छूकर अगर छू ले किसी को फिर।
ते'रा आशिक बनाती है ते'रा कायल बनाती है।---वाह्ह्ह  बहुत शानदार शेर .

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 10:40pm
आदरणीय महर्षि जी धन्यवाद
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 10:40pm
आदरणीय मिथिलेश जी बहुत बहुत आभार

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