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सूरज बोला रात से, आना नदिया पास।
घूँघट ओढ़े मैं मिलूँ , मिल खेलेंगे रास । ।


गोद निशा रवि आ गया , सोया घुटने मोड़ ।
चन्दा भी अब चल पड़ा , तारा चादर ओढ़ । ।


पीड़ा वो ही जानता , खाए जिसने घाव ।
पाटन दृग रिसत रहे ,कोय न समझा भाव । ।

विरह मिलन दो पाट हैं, जानत हैं सब कोय ।
सबहि खुशी गम सम रहे, दुःख काहे को होय। । 

नदिया धीरे बह रही ; पुरवइया का जोर ।
चाँद ठिठोली कर रहा , चला क्षितिज जिस ओर । ।


बदरा घूँघट जा  छिपा  , चन्द्रमा  का  प्रकाश ।  
पिया मिलन को आ रहे, हिया उड़ा आकाश ।।


घाट घाट साधू फिरे , भरे कमंडल नीर।
नदिया सा जीवन बहे , शांत सुखद गंभीर । ।

मौलिक / अप्रकाशित
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

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Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 27, 2015 at 9:56am

 आदरणीय श्री गिरिराज भंडारी जी 

सादर अभिवादन 

आपका स्नेह मिला , आभार , 

१- 

विरह मिलन दो पाट हैं, जानत हैं सब कोय ।
सबहि खुशी गम सम रहे, दुःख काहे को होय। ।--संशोधित 

२- बदरा घूँघट जा  छिपा  , चन्द्रमा  का  प्रकाश । --- मात्रा  पूरी कर दी, अब ठीक हो तों पोस्ट संशोधित कर ली जाए , 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 26, 2015 at 8:32am

आदरणीय प्रदीप भाई , सभी दोहे बहुत अच्छे रचे हैं , आपने । आपको हार्द्क बधाइयाँ ।

गम खुशी सबहि सम रहे, दुःख काहे को होय । ।  -- इस पंक्ति मे गेयता बाधित है  , इसे यों कर लीजिये  --

सबहि खुशी गम सम रहे, दुःख काहे को होय । ।

चन्दा का प्रकाश ।   -- इस पद मे मात्रा कम है

दोहा वली के लिये आपको बधाइयाँ ।

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 25, 2015 at 11:06pm

आदरणीया   kalpna mishra bajpai जी सादर आभार , प्रोत्साहन हेतु . 

Comment by kalpna mishra bajpai on July 25, 2015 at 7:57pm

बहुत सुंदर दोहे 

कृपया ध्यान दे...

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