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दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ /कान्ता राॅय

धूमिल होती भ्रांति सारी, गण-गणित मैं तोड़ रही हूँ
कलम डुबो कर नव दवात में, रूख समय का मोड़ रही हूँ
                          मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......

नई भोर की चादर फैली, जन-जीवन झकझोर रही हूँ
धधक रही संग्राम की ज्वाला, सागर सी हिल-होर रही हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......

टूटे हृदय के कण-कण सारे, चुन-चुन सारे जोड़ रही हूँ
उद्वेलित मन अब सम्भारी, विषय-जगत अब छोड़ रही हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ .....

मृदंग- मृदंग सा है मन मेरा, हरकाती सी शोर रही हूँ
क्षितिज रखी है मैने अंगुली, प्रत्यक्षित हिलकोर रहीं हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ .........

रोक सको दम गर है तुममें, प्रलय-प्रकाश जोड़ रहीं हूँ
आत्म स्वरों को रौंदने वालें नर - नारायण तोड़ रहीं हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ........

शक्ति प्रकृति ढोना होगा, मन मृगछाल ओढ रही हूँ
पग-पग रक्तबीज राजे है, अस्त्र अक्षर बल जोर रही हूँ
                              मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ .........

सिंहासन डोले मनु रक्षक का, ठीकर सारे फोड़ रही हूँ
कोंपलें नई फूट रही है, निर्माण सेतु जोड़ रही हूँ
                          मैं दुर्गेश्वरी मै बोल रही हूँ .......
 


कान्ता राॅय
भोपाल

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 1448

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Comment by RAJENDER KUMAR GAUR on December 16, 2015 at 7:13pm
हुंकार करे नारी पूरा समाज हो लाभावंतित
Comment by SANJAY KUMAR JHA on August 24, 2015 at 7:39am

बहुत सुन्दर रचना ,हार्दिक बधाई !

Comment by kanta roy on August 18, 2015 at 7:53am
आपको रचना पंसद आई मेरा लिखना सफल हुआ । आभार तनुजा उप्रेती जी ।
Comment by kanta roy on August 18, 2015 at 7:51am
हृदयतल से आभार आपको आदरणीया ममता जी रचना पसंदगी हेतु ।
Comment by Tanuja Upreti on August 13, 2015 at 11:10am

इस सुन्दर रचना हेतु बधाई कांता  जी 

Comment by Mamta on August 13, 2015 at 11:07am
जी मगर ये भी सच है कि शिष्य अपनी योग्यता के अनुसार ही ज्ञान का विस्तार करता है,मेरी बधाई में आपका हिस्सा भी है। ओबीओ समूह के लिए सभी शिष्य आभारी हैं और रहेंगे!

सादर ममता






जी मगर ये भी सच है कि शिष्य अपनी योग्यता के अनुसार ही ज्ञान का विस्तार करता है,मेरी बधाई में आपका हिस्सा भी है। ओबीओ समूह के लिए सभी शिष्य आभारी हैं और रहेंगे!

सादर ममता
Comment by kanta roy on August 13, 2015 at 10:57am
ओबीओ के मंच पर ही कविता लिखने संबंधी तकनीक का सीखना शनैः शनैः जारी है । मेरी इस प्रस्तुति का समस्त श्रेय मुझसे अधिक ओबीओ परिवार को जाता है । आभार आपको आदरणीया ममता जी रचना पसंदगी के लिए ।
Comment by kanta roy on August 13, 2015 at 10:54am
आदरणीया आशा जी ,हृदयतल से आपका आभार रचना को पसंद करने हेतु ।
Comment by Mamta on August 12, 2015 at 9:41am
आदरणीया कान्ता जी गेय व समष्टि का स्वर समेटे आपकी रचना मनमोहक है
बधाई!
सादर ममता
Comment by asha jugran on August 11, 2015 at 11:57pm

बहुत् सुंदर कांता जी ...गज़ब छंद-बंध और शब्द संयोजन 

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