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Tanuja Upreti
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Tanuja Upreti commented on Tanuja Upreti's blog post मैं क़ैदी हूँ
"रचना को पसंद करने और सराहने के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय विजय जी,आदरणीय अशोक जी एवं श्री सुनील जी ,बहुत बहुत आभार।"
Jul 18, 2016
Dr. Vijai Shanker commented on Tanuja Upreti's blog post मैं क़ैदी हूँ
"बहुत ही सार्थक प्रस्तुति , बधाई , आदरणीय सुश्री तनुजा उप्रेती जी , सादर।"
Jul 18, 2016
Ashok Kumar Raktale commented on Tanuja Upreti's blog post मैं क़ैदी हूँ
"आदरणीया तनुजा उप्रेती जी सादर, उत्तम अभिव्यक्तियाँ हैं आपकी, सच है समाज और सरकार की बेशर्मी ने अव्यवस्था को ही व्यवस्था बना दिया है. सादर."
Jul 18, 2016
shree suneel commented on Tanuja Upreti's blog post मैं क़ैदी हूँ
"मैं क़ानून की क़ैदी हूँ... मैं वर्जनाओं की क़ैदी हूँ... मैं व्यवस्था की क़ैदी हूँ... सोचने पर विवश करती है ये कविता. बहुत ख़ूब! इस सार्थक कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई आपको आदरणीया तनूजा जी. सादर."
Jul 18, 2016
Tanuja Upreti commented on Tanuja Upreti's blog post मैं क़ैदी हूँ
"हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर जी"
Jul 17, 2016
Samar kabeer commented on Tanuja Upreti's blog post मैं क़ैदी हूँ
"मोहतरमा तनुजा जी आदाब,बहुत अच्छी लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 16, 2016
Tanuja Upreti posted a blog post

मैं क़ैदी हूँ

कितने ही गिद्धमानव आकाश में मुक्त होकर उड़ रहे हैं क्योंकि उनके मुँह पर खून के निशान नहीं पाये गए और तीन सौ रुपये चुराने वाला अपनी सज़ा के इंतज़ार में वर्षों जेल में सड़ता रहा मैंने एक अवयस्क बलात्कारी को हत्या करने के बाद इत्मीनान से सुधारगृह जाते हुए देखा हैमैं क़ानून की क़ैदी हूँ । स्टोव हों या कि बदले जमाने के गैस चूल्हे बस बहू का आँचल थामते हैं 'न' सुनकर जगे पुरुषत्व के नाखूनों से रिसते तेज़ाब से झुलसता आ रहा है स्त्री का चेहरा अंतरिक्ष को बींधती ,समुद्र को चीरती महिला के कपड़ों की लंबाई पर…See More
Jul 16, 2016
maharshi tripathi commented on Tanuja Upreti's blog post काँटे का इंटरव्यू
"एक अच्छा संदेश देती इस कविता पर ढेरों बधाई आ !!!"
Jun 7, 2016
pratibha pande commented on Tanuja Upreti's blog post काँटे का इंटरव्यू
",काँटा जब पैर पड़ता है तभी चुभता है ,जानवर भी जब उकसाया जाता है तभी नुक्सान करता है , पूरी सृष्टि में एक मनुष्य ही  है जो बिना उकसाए भी दूसरों को दुःख देता है,   और फिर शिकायत भी करता है ,   सुन्दर सार्थक रचना पर बधाई प्रेषित है…"
Jun 6, 2016
BAIJNATH SHARMA'MINTU' commented on Tanuja Upreti's blog post काँटे का इंटरव्यू
"आदरणीया तनुजा जी ...................बहुत बढ़िया | बधाई "
Jun 5, 2016
Tanuja Upreti commented on Rahila's blog post इतिहास गवाह है(लघुकथा )राहिला
"बहुत बढ़िया लघुकथा, हार्दिक बधाई"
Jun 5, 2016
Tanuja Upreti commented on Tanuja Upreti's blog post काँटे का इंटरव्यू
"धन्यवाद शहजाद जी एवं प्रिय राहिला जी"
Jun 5, 2016
Sheikh Shahzad Usmani commented on Tanuja Upreti's blog post काँटे का इंटरव्यू
"आप दोनों की भेंटवार्ता से सबक़ लेते हुए मज़े ले रहा था कि इंटर्व्यू ख़त्म हो गया! मुझे लगा कि उसे दोबारा पीड़ा भोगने का अवसर देने के लिए उसी जगह छोड़ने के बजाए स्मृति चिन्ह की तरह ससम्मान संजो के रखा जाता , तो बेहतर होता। सुंदर भावपूर्ण प्रेरक कसी…"
Jun 5, 2016
Rahila commented on Tanuja Upreti's blog post काँटे का इंटरव्यू
"हा. .हा. .हा. .बहुत, बहुत खूब, वाह. .बहुत शानदार रचना आदरणीया दीदी! बहुत बधाई । सादर"
Jun 5, 2016
Tanuja Upreti posted a blog post

काँटे का इंटरव्यू

क्यों भाई काँटेशरीर ढूँढते रहते हो चुभने के लिए? पैर से खींचकर निकाले गए काँटे से मैंने पूछा बस फैंकने को तत्पर हुई कि वह बोल उठा तुम मनुष्यों की यही तो दिक़्क़त है अपनी भूलों का दोष तटस्थों पर मढ़ते आये हो मैं कहाँ चल कर आया था तुम्हारे पैरों तक ,चुभने को मैं नहीं तुम्हारा पैर आकर चुभा था मुझको मैँ ध्यान मग्न पड़ा था कि अचानक एक भारी सा पैर आकर सीधा धँसा था मेरे पूरे शरीर पर उफ्फ वह घुटन भरी पीड़ा ख़ून का नमकीन स्वाद..उबकाई तुमने अनुभव किया क्या ? तुम्हारा बिन्दु भर भाग और मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व…See More
Jun 5, 2016
Tanuja Upreti commented on Tanuja Upreti's blog post ब्रह्म सार
"बहुत बहुत धन्यवाद कल्पना जी एवं कांता जी ,हार्दिक आभार"
Jun 3, 2016

Profile Information

Gender
Female
City State
Dehradun, Uttarakhand
Native Place
Almora
Profession
Inspector,Central Excise & Service Tax Department
About me
I live for writting

Tanuja Upreti's Blog

मैं क़ैदी हूँ

कितने ही गिद्धमानव

आकाश में मुक्त होकर

उड़ रहे हैं

क्योंकि उनके मुँह पर

खून के निशान नहीं पाये गए

और तीन सौ रुपये चुराने वाला

अपनी सज़ा के इंतज़ार में

वर्षों जेल में सड़ता रहा

मैंने एक अवयस्क बलात्कारी को

हत्या करने के बाद इत्मीनान से

सुधारगृह जाते हुए देखा है

मैं क़ानून की क़ैदी हूँ ।



स्टोव हों या कि

बदले जमाने के गैस चूल्हे

बस बहू का आँचल थामते हैं

'न' सुनकर जगे पुरुषत्व के

नाखूनों से रिसते तेज़ाब से…

Continue

Posted on July 15, 2016 at 3:30pm — 6 Comments

काँटे का इंटरव्यू

क्यों भाई काँटे

शरीर ढूँढते रहते हो चुभने के लिए?

पैर से खींचकर निकाले गए

काँटे से मैंने पूछा

बस फैंकने को तत्पर हुई कि

वह बोल उठा

तुम मनुष्यों की

यही तो दिक़्क़त है

अपनी भूलों का दोष

तटस्थों पर मढ़ते आये हो

मैं कहाँ चल कर आया था

तुम्हारे पैरों तक ,चुभने को

मैं नहीं तुम्हारा पैर आकर

चुभा था मुझको

मैँ ध्यान मग्न पड़ा था

कि अचानक एक भारी सा पैर

आकर सीधा धँसा था

मेरे पूरे शरीर पर

उफ्फ वह घुटन भरी…

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Posted on June 5, 2016 at 10:30am — 7 Comments

ब्रह्म सार

हरे वृक्षों के बीच खडा एक ठूँठ।

खुद पर शर्मिन्दा, पछताता हुआ

अपनी दुर्दशा पर अश्रु बहाता हुआ।

पूछता था उस अनन्त सत्य से

द्रवित, व्यथित और भग्न हृदय से।

अपराध क्या था दुष्कर्म किया था क्या

मेरे भाग में यही दुर्दिन लिखा था क्या?

जो आज अपनों के बीच मैं अपना भी नही

उनके लिए हरापन सच, मेरे लिए सपना भी नही।

हरे कोमल पात उन्हें ढाँप रहे छतरी बनकर

कोई त्रास नहीं ,जो सूरज आज गया फिर आग उगलकर।

अपनी बाँह फैलाए वे जी रहे…

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Posted on May 30, 2016 at 4:37pm — 5 Comments

हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है मज़हब अपना

सज़दे में सर झुकता है मेरा
राह चलते जहाँभी दरगाह मिली
तुम्हारे मन भी तो इज़्ज़त है
मेरे शंकर और मेरे राम की
जब उर्स होता है तो मैं भी
आती हूँ चादर चढ़ाने को
दशहरे में तुम भी जाते हो
रावण जलाने को
हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है
मज़हब अपना
हाँ सियासत नहीं भूलती
मैं हिन्दू तू मुसलमान है
अब ये अलग बात है कि
मैं अगर इज़्ज़त हूँ
अपने भारत की
तो तू भी 
हिन्द का सम्मान है ।
तनूजा उप्रेती

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on May 23, 2016 at 1:10pm — 2 Comments

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At 5:25pm on September 28, 2015, pratibha pande said…

जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ 

At 4:14am on September 28, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 9:53pm on June 1, 2015, Dr. Vijai Shanker said…

 धरती रोती  है "पर पुनः एक बार बधाई, सर्वश्रेठ रचना चुने जाने पर , आदरणीय सुश्री तनुजा जी।  

At 10:22pm on May 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीया तनूजा उप्रेती जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी रचना "धरती रोती है" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 6:27pm on March 21, 2015, Saumitra Mohan joshi said…
हदय से लिखी गयी बहुत सुंदर रचना
 
 
 

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