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ठठरी पर ईमानदारी /लघुकथा /कान्ता राॅय

ईमानदारी जरा चोटिल ही हुई थी कि मौके का फायदा उठा कुछ लोगों ने उसे निष्प्राण घोषित कर तुरत - फुरत में ठठरी पर कसने लगे । उन्हे डर था उसके वापस जिंदा हो गतिमान होने का ।
जिन चार कंधों पर उसकी अर्थीं उठाई जा रही थी उनमें सबसे आगे देश के कर्णधार थे उसके पीछे भ्रष्टाचार , देश के सफलतम व्यवसाई और शेयर दलाल थे ।
सबकी आँखें चमक रही थी । सबके मन में लड्डू फूट रहे थे कि पीछे रोती हुई जनता अचानक खुशी के मारे तालियाँ बजाने लगीं ।
तालियों की शोर पर काँधे देने वालों ने चौंक कर देखा तो ईमानदारी सारी रस्सी तोड़कर उठ बैठी थी ।
.
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on August 13, 2015 at 5:14pm
मै समझ गई कि ये चुक साहित्यिक दृष्टिकोण से एक विशेष गलती है जिसे लिखते वक्त ध्यान रखे जाने की बेहद जरूरत है । रचना पर आपकी उपस्थिति रचना को एक नवीन तराश के साथ मजबूती दे जाती है हमेशा ही । एक नये दृष्टिकोण का स्थापित कर देना लेखक के मन यही आपकी प्रतिक्रिया का सार निकल कर आता है हमेशा । सादर नमन आपको बारम्बार आदरणीय सौरभ पाण्डेय सर जी ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 13, 2015 at 4:31pm

लघुकथा अच्छी लगी, आदरणीया कान्ताजी. हार्दिक बधाई.

जिन चार कंधों पर उसकी अर्थीं उठाई जा रही थी उनमें सबसे आगे नेता थे उसके पीछे भ्रष्टाचार , देश के सफलतम व्यवसाई और शेयर दलाल थे । 

उपर्युक्त वाक्य को और व्यवस्थित एवं तार्किक करें, आदरणीय़ा.

नेता के पीछे काँधा देते ’भ्रष्टाचार’ का क्या व्यक्तिकरण (personification) हो गया था ? भ्रष्ट विशेषण के साथ कोई संज्ञा होगी न ? फिर देश के सफलतम व्यवसायी और शेयर दलाल सभी जुट गये थे काँधा देने में ? समूहवाचक संज्ञा भी एकवचन में व्यवहृत होती है यदि उसे जातिवचक बना कर प्रयुक्त किया जाये.

लघुकथा के इंगित वस्तुतः प्रहारक हैं.

शुभेच्छाएँ

Comment by kanta roy on August 13, 2015 at 11:24am
मेरा हौसला बढाने हेतु आदरणीय श्री सुनील जी तहे दिल से आभारी हूँ ।सब आप गुरू जनों से ही प्रेरित हो कर लिख रही हूँ । सादर
Comment by shree suneel on August 9, 2015 at 6:40pm
व्वाहह..बहुत ख़ूब.. आदरणीया कांता राॅय जी, आप अपनी पूरी विशेषताओं के साथ यहाँ भी हैं. बहुत प्रभावित किया इस लघु-कथा नें. हार्दिक.. हार्दिक बधाइयाँ आपको इस समर्थ लघु-कथा के लिए. सादर.
Comment by kanta roy on August 8, 2015 at 7:25am
अापके द्वारा कहें गये ये एक शब्द दुनिया भर के तमाम शब्दों पर भारी पड़ जाते है आदरणीय रवि जी । आपके द्वारा ये अनुपम "वाह " का पाना मुझे अचंभित कर गया कि क्या सच में कथा इतनी अच्छी है ..... आज पहली बार मुझे अपना लिखना कुछ लिखने जैसा का आभास हुआ । सादर अभिनंदन आपको ।
Comment by kanta roy on August 8, 2015 at 7:19am
आपके कहे से मै सहमत हूँ आदरणीय डा. विजय शंकर जी कि इमानदारी से सदा खतरा रहा है बेईमानी को लेकिन सदियों से इमानदारी अपना वजूद कायम कर अपने वर्चस्व का परचम फहराती ही रही । कथा पर आपका प्रोत्साहन भरे शब्द मुझे बेहद अच्छे लगे । सादर नमन आपको ।
Comment by kanta roy on August 8, 2015 at 7:16am
आभार आपको आदरणीय नरेंद्र जी रचना पसंद करने हेतु ।
Comment by kanta roy on August 8, 2015 at 7:15am
आदरणीय तेजवीर जी ,मेरी कोशिश पर मेरा हौसला वर्धन के लिये आभार आपको ।
Comment by kanta roy on August 8, 2015 at 7:13am
आभार आपको कथा का भाव पसंद करने हेतु आदरणीय विनय सर जी ।
Comment by kanta roy on August 8, 2015 at 7:12am
रचना पसंदगी के लिए आभार आपको आदरणीय ओमप्रकाश जी ।

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