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ग़ज़ल
(वहर 22 22 22 22 2 )

वो फिर घुस आया ,मन के समन्दर I
मैं छोड़ आया  जिसे मन्दिर अंदर  II

सब कसमें लेते हैं बदले की ,
अब रहे कहां बापू के बन्दर I

आजिज कोई हो नेमत देता ,
है कोई ऐसा मस्त कलन्दर I

अबरोधों से खुद है तुम्हें लड़ना ,
सम्भालो तुम अपने सभी सन्दरI

धन बल ज्ञान न बंधे जाति में ,
कौन यहाँ मुफलिस कौन सिकन्दर I

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by कंवर करतार on September 21, 2015 at 10:35pm

भाई श्याम वर्मा जी, ग़ज़ल की सराहना के लिए तहदिल से आभारी हूँI  

Comment by कंवर करतार on September 21, 2015 at 10:32pm

भण्डारी भाई ,ग़ज़ल प्रयास की सराहना के लिए दिल की गहराइयों से शुक्रिया कवूल करें I आपकी टिपणियां बिलकुल वाजिब हैं I

मतले के सानी में , ठीक कहा आपने की मन्दिर नहीं आना चाहिए Iसुधारने की कोशिश करता हूँ Iआप की टिपणी सदैब चाहूँगा iसाभार 


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Comment by गिरिराज भंडारी on September 21, 2015 at 9:25pm

आदरणीय डा. कंवर करतार भाई , गज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ।
मतला आपका कुछ और समय चाहता है , काफिया  मतले के उला मे और बाक़ी सभी शेर मे अंदर  आ रहा है और , पर मतले के सानी मे मंदिर शब्द लेने के कारण , काफिया अंदिर आ रहा है , वहाँ भी मंदर लेना चाहिए था , वैसे मन्दर शब्द सही है या  नही , मै नही कह कह सकता । थोड़ा सोच लीजियेगा ।

Comment by Shyam Narain Verma on September 21, 2015 at 4:44pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई!

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