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किस तरह से दशहरा मनायें; राम जी रावणी मन हुआ है।
राम नामी वसन पर न जायें, राम जी रावणी मन हुआ है।।
वासना से भरा है कलश ये, हो गया कामनाओं के वश में।
भेष साधू का झूठा, भुलायें राम जी रावणी मन हुआ है।।
स्वर्ण का ये महल चाहता है, मन्त्र बस धन का ये बांचता है।
किस तरह से "स्वयं" को जगायें, राम जी रावणी मन हुआ है।।
स्वार्थ का आचरण हर घड़ी है, नेक नीयत दफ़न हो गयी है।
आज खुद को विभीषण बनायें, राम जी रावणी मन हुआ है।।
लोभ के मोह के मद के वश में, हो गया हूँ हाँ "मैं" से विवश मैं।
कैसे भीतर का रावण जलायें, राम जी रावणी मन हुआ है।।
मौलिक अप्रकाशित
Comment
आदरणीय पंकज भाई वाह वाह दिल खुश कर दिया आपने ये ग़ज़ल कहकर
बह्र की लय पकड़ में नहीं आई मगर कथ्य ने दिल को छू लिया और बिलकुल नया प्रयोग लगा
कुल मिलाकर शानदार
आपको बहुत बहुत बधाई
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