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हरेक बात, करामात कह रहा हूँ मैं-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

1212 - 1122 - 1212 – 22

 

हरेक बात, करामात कह रहा हूँ मैं

वो दिन को रात कहें, रात कह रहा हूँ मैं

 

लगे है आज तो खाली ख़याल अच्छे दिन

बदल रहें न ये हालात, कह रहा हूँ मैं

 

यकीं नहीं है जिन्हें शह को शह नहीं कहते

क़ुबूल है ये मुझे मात,   कह रहा हूँ मैं

 

जो कह रहा हूँ उसे वाकिया समझ बैठे

करें जो गौर, वजूहात कह रहा हूँ मैं

 

हुई है रूह फकीरी में इस तरह तारी

हरेक दिन को जुमेरात कह रहा हूँ मैं

 

वो दिन भी आएगा खुर्शीद जब नहीं होगा

अगर थमेंगे न ज़ुल्मात कह रहा हूँ मैं

 

ये दिल की बात, ये फिक्रो-ख़याल है साहब

जो देखता हूँ वही बात कह रहा हूँ मैं

 

खुदा न मान के आदम कहा, शिकायत ये

कि उन की जात को कमजात कह रहा हूँ मैं

 

ये चाक दिल भी शराफत से सी लिया मैंने

इन आँसुओं को भी बरसात कह रहा हूँ मैं

 

 

------------------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 12, 2015 at 9:58pm

आदरणीय विजय निकोर सर ग़ज़ल पर सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 12, 2015 at 9:57pm

आदरणीय समर कबीर जी, सराहना मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार. आपके मार्गदर्शन अनुसार मिसरे को यूं कहा है-
जमीन बन रही ज़ुल्मात कह रहा हूँ मैं

Comment by vijay nikore on November 11, 2015 at 12:48pm

 // 

ये चाक दिल भी शराफत से सी लिया मैंने

इन आँसुओं को भी बरसात कह रहा हूँ मैं//

बहुत ही खूबसूरत गज़ल ! आनन्द आ गया। हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on November 10, 2015 at 10:46pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

"अगर थमेंगे न ज़ुल्मात कह रहा हूँ मैं"

इस मिसरे में "ज़ुल्मात" के साथ "थमना" मुझे मुनासिब नहीं लगता,अफ़्रीक़ा के घने जंगलों में एक जगह ऐसी है जहाँ कभी सूरज की रोशनी नहीं पँहुची,उस जगह को "ज़ुल्मात" कहते हैं, 'अल्लामा इक़बाल' की नज़्म 'शिकवा' की दो पंक्तियाँ याद आ गईं :-

"दश्त तो दश्त हैं ,दरिया भी न छोड़े हमने
बह्र-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिये घोड़े हमने"

इस पंक्ति में उसी जगह का ज़िक्र किया गया है ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 10, 2015 at 6:19pm

आदरणीय श्याम नरेन् जी इस सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आभार 

Comment by Shyam Narain Verma on November 9, 2015 at 11:14am

बहुत खूब ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गजल पर आपको दिल से बधाई

सादर

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