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अन्तर्मन के दीप जलाकर। " अज्ञात "

अंतर्मन के दीप जलाकर,                                               

जग में उजियारा कर दो।                                                             

जले प्रेम का दीपक जगमग,                                            

जगमग जग सारा कर दो।                   
शीतलता का घृत हो अनुपम,                     

अति सनेह का दीपक हो,                                       

ज्ञान की बाती उल्लासित कर,                 

पुलकित मन प्यारा कर दो।                     
प्रगतिशील हो राह लक्ष्य की,                   

दृढ़ निश्चय हो ठाह चित्त की,                 

सबको सुगमित राह दिखाकर,          

विजयी हर हारा कर दो ,                     
खण्ड खण्ड हो अवगुण प्रतिपल,                  

हो अखण्ड अब समुचित कौशल,                  

मन के भीतर अंधकार है ,                    

प्रज्ज्वल एक तारा कर दो ।
नर नारी में नैतिक बल हो ,                       

नवल, नीतिगत, स्वच्छ, धवल हो,              

शक्ति,साधना,चाह प्रबल हो,                                                                                      प्रभु परिणति प्यारा कर दो ।           
अन्तर्मन के दीप जलाकर,                          

जग में उजियारा कर दो।                        
अजय शर्मा " अज्ञात  "

मौलिक एवं अप्रकाशित।

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Comment by मिथिलेश वामनकर on November 12, 2015 at 11:30pm

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