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Ajay Kumar Sharma
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Ajay Kumar Sharma posted a blog post

उनका दिल भी कभी क्यों पिघलता नहीं

कैसे दिल को सम्हालूं मैं बाज़ार में,उनसे खुद का दुपट्टा सम्हलता नहीं,राख करती मुझे मेरे दिल की तपिश, उनका दिल भी कभी क्यों पिघलता नहीं ,आज की शाम ऐसे कभी भी न थी,पहले बदनाम ऐसे कभी भी न थी,ख्वाब हम ने हजारों हैं पाले मगर,उनके दिल में कोई ख्वाब पलता नहीं,कैसे दिल को....दिल में गहरा समन्दर भी है प्यार का,डगमगाता पथिक हूं मैं मझधारका,बादलों से घिरा सारा आकाश है,चांद कोई कभी क्यों निकलता नहीं..अजय शर्मा "अज्ञात"मौलिक एवं अप्रकाशित See More
Aug 8, 2024
Ajay Kumar Sharma commented on SALIM RAZA REWA's blog post हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ  -सलीम रज़ा रीवा
"सलीम रजा साहब बधाई स्वीकार करें. बहुत सुन्दर गजल."
Apr 11, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
kaushambi
Native Place
kaushambi
Profession
Ex defence personnel
About me
absolute positive thinker

मैंने भी कुछ सोंचा ---

मौन रहकर साज भी,

हैं ध्वनित होते नहीं,

कुछ बोलने दे आज,

मन की बात कहने दे मुझे।

है नहीं ख्वाहिश कि,

सुन्दर सा सरोवर मैं बनूँ

धार हूँ नदिया की मैं,

मत रोक बहने दे मुझे।

हर एक पल भी खुशनुमा,

होता नहीं तकदीर में,

हौसलों के साथ में,

कुछ गम भी सहने दे मुझे।

"अज्ञात" का आधार प्रभु,

अज्ञात का है हमसफ़र,

मत छोड़ मेरा हाथ,

अपने साथ रहने दे मुझे।

चाह इतनी भी नहीं,

सब लोग पहचाने मुझे,

अज्ञात था, अज्ञात हूँ,

अज्ञात रहने दे मुझे।।

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At 2:23am on October 2, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है।

Ajay Kumar Sharma's Blog

उनका दिल भी कभी क्यों पिघलता नहीं

कैसे दिल को सम्हालूं मैं बाज़ार में,

उनसे खुद का दुपट्टा सम्हलता नहीं,

राख करती मुझे मेरे दिल की तपिश, 

उनका दिल भी कभी क्यों पिघलता नहीं ,

आज की शाम ऐसे कभी भी न थी,

पहले बदनाम ऐसे कभी भी न थी,

ख्वाब हम ने हजारों हैं पाले मगर,

उनके दिल में कोई ख्वाब पलता नहीं,

कैसे दिल को....

दिल में गहरा समन्दर भी है प्यार…

Continue

Posted on August 7, 2024 at 1:13pm

मन में ही हार, जीत मन में..

मन में ही हार, जीत मन में,

मन में ही अर्थ-अनर्थ लिखा,

लेखनी बदल दे मनोभाव,

तो समझो सत्य, समर्थ लिखा !



यदि प्रेम प्रस्फुटित हो मन में,

अनुराग परस्पर संचित हो,

नि:स्वार्थ भावना हो शाश्वत,

कोई भी नहीं अपवंचित हो,

जब हो समाज में रामराज्य,

तो समझो सार्थक अर्थ लिखा !



यदि छद्म भेष, छल दम्भ द्वेष,

मानव में ही घर कर जाये,

यदि राम कृष्ण की जन्मभूमि,

पर मानवता ही मर जाये,

यदि मन मलीन हो, जड़वत हो,

तो लगा, कदाचित् व्यर्थ… Continue

Posted on August 10, 2018 at 10:27am — 12 Comments

जमकर नींद सताये रे

इम्तहान के दिन में काहे ,

जमकर नींद सताये रे.

पुस्तक पर जब नजर पड़े ,

तो दुविधा से मन काँप उठे ,

काश,कहीं मिल जाती सुविधा,                                     नइया पार कराये रे .

हर पन्ना पर्वत सा लागे ,

लगे पंक्तियां भी भारी ,

प्रश्नों की तलवार दुधारी ,

रह रह आँख दिखाये रे.

चार दिनों में होना ही है ,

दो दो हाथ पुस्तिका से ,

क्या लिक्खूंगा उत्तर उस पर ,

मन मेरा भरमाये रे…

Continue

Posted on May 5, 2018 at 4:54pm — 3 Comments

कैसे करे व्यंग रे...

बीत गई सर्दी , बीत गई ठंड रे ,

दिनभर लुआर बहे गर्मी प्रचंड रे ,

चार दिन की चाँदनी सा प्यारा बसंत था,

पसीने की बूंदों से भीगा अंग-अंग रे ,

स्वेटर,कमीज,कोट लिपटे कई असन वस्त्र,

छोड़छाड़ देह को हुए खंड-खंड रे ,

गर्मी की चुभन से हाल बेहाल हुआ ,

"अज्ञात" कैसे ! कैसे करे व्यंग रे .

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on February 3, 2018 at 10:30pm — 4 Comments

 
 
 

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