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मन तुम भी-गजल(मनन)

2212 2212 2122 22 12
सबने कही अपनी कथा अब कहो मन तुम भी अभी,
कितनी रही व्यथा बता चुप न रो मन तुम भी अभी।
चलते रहे हो साथ मेरे चला हूँ जिस मग जहाँ
करता रहा हूँ बात मैं अब करो मन तुम भी अभी ।
राजा मुझे मन का कहा जँच गया था मुझको कहूँ
बहता रहा मन- मौज अब बह चलो मन तुम भी अभी ।
टूटे हुए सब ख्वाब मैंने बटोरे फिर फिर यहाँ
बिखरे सभी जितने बटे आ बटो मन तुम भी अभी ।
कितनी कलाएं साधता आ गया मैं हूँ अब यहाँ
सधता गया बस काल है अब कहो मन तुम भी अभी।
बेमन बजी ताली बहुत पीठ पीछे खंजर चले
मैं तो गया हूँ उब यहाँ मत डुबो मन तुम भीअभी।
मुझको लगा चल दूँ अभी से कहीं भी चाहे जहाँ
कर 'मनन' रुख देखा अभी कुछ रुको मन तुम भी अभी।
मौलिक व अप्रकाशित@

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Comment by Manan Kumar singh on December 18, 2015 at 7:04am
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