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गजल
2122 2122
**************************
मैं चलो सपने सजा दूँ
आ सुनो अब गीत गा दूँ।
जो पड़ीं सोयी जहन में
ख्वाहिशें फिर से जगा दूँ।
जो बुझी है आरजू अब
आ उसे जलना सिखा दूँ।
है पड़ी सूनी डगर अब
राग मीठा गुनगुना दूँ ।
चल अली सूनी गली का
साँस से रिश्ता लगा दूँ ।
रश्मियों से आरती कर
आ अभी पलकें बिछा दूँ।
छू गया कबका पवन मुख
बन हवा तुझको रिझा दूँ।
छा रहीं मुख पे घटायें
आ अभी फिरसे सजा दूँ।
ताप तेराअब शमन कर
नेह की सरिता बहा दूँ।
री कली तू अधखिली-सी
चल कहीं आँचल उड़ा दूँ।
कब तलक सिमटी रहेगी
लाज का घूँघट उठा दूँ।
मौलिक व् अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on December 23, 2015 at 5:31pm
आभार सतविंदर जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 13, 2015 at 2:48pm
वह्ह्ह्ह्ह्!बहुत ख़ूब।
Comment by Manan Kumar singh on December 13, 2015 at 1:27pm
आदरणीय मिथिलेश जी,आभार आपका
Comment by Manan Kumar singh on December 13, 2015 at 1:26pm
आदरणीय मोहन जी,आभार आपका

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 7, 2015 at 4:35am

आदरणीय मनन जी इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

Comment by मोहन बेगोवाल on December 6, 2015 at 10:15pm

  बहुत बधाई हो -छोटी बहर की सुंदर ग़ज़ल कहने की

Comment by Manan Kumar singh on December 6, 2015 at 11:27am
आदरणीय गिरिराज भाई,आपके प्रेरणा के शब्द मेरा हौसला हैं;आभार आपका।
Comment by Manan Kumar singh on December 6, 2015 at 11:26am
आ.लक्ष्मण जी,प्रेरणापरकता के लिए आपका आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2015 at 11:03am

आदरणीय मनन भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है , आपको दिली बधाइयाँ गज़ल के लिये ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 6, 2015 at 8:12am

बहुत खूब ...आ० मनन भाई ,हार्दिक बधाई l

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