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मोहन बेगोवाल
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  • Amritsar
  • India
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Samar kabeer commented on मोहन बेगोवाल's blog post कीमत
"जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब, लघुकथा का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । एक बात ध्यान में रखें कि किसी भी विधा में लिखने के लिए उस विधा के बारे में बहुत अध्यन करना होता है, हमारे ओबीओ पर हर विधा के बारे में आपको आलेख मिल जाएँगे, उनका अध्यन करें, और…"
Sep 6
Manoj kumar Ahsaas commented on मोहन बेगोवाल's blog post कीमत
"लघु कथा का अच्छा प्रयास हुआ है आदरणीय अभी कथनों को स्पष्ट रूप से प्रगट करने के लिए आप को और अधिक प्रयास करना चाहिए सादर आभार"
Sep 3
मोहन बेगोवाल posted a blog post

कीमत

 आज जब सुबह मैं सैर कर रहा था , तब इक आवाज़ मेरे कानों से टकराई ,साहिब जी नमस्कार । मैंने खुद को रोका और उस पर नज़र डाली, आज उसने बहुत सुंदर लाल कमीज़,काली ऐनक और सिर पे टोपी पहनी हुई थी । धीरे से उस ने अपनी ट्राई साइकिल मेरे पास लाते हुए कहा,"साहिब जी, आज भोले नाथ का जन्मदिन है ,आज कुछ हो जाए,ये मुझे समझ आ गया था ।"क्योंकि वह जब भी मुझे मिलता, उस को उम्मीद होती कि मैं उसे कुछ पैसे दूं।" "नहीं भाई, आज शिव रात्रि नहीं, भाई आज तो जन्माष्टमी है ।" "मैंने उस की ट्राईविलर के पास जाते हुए कहा।" "आप…See More
Sep 1
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"  आज जब सुबह मैं सैर कर रहा था , तब इक आवाज़ मेरे कानों से टकराई ,साहिब जी नमस्कार ।मैंने खुद को रोका और उस पर नज़र डाली, आज उसने बहुत सुंदर लाल कमीज़,काली ऐनक और सिर पे टोपी पहनी हुई थी ।धीरे से उस ने अपनी ट्राई साइकिल मेरे पास लाते हुए…"
Aug 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"   आदरनीय अजेय जी , समाजिक तब्दीली कि शुरुआत इतनी जल्दी नहीं होती , जब होती है , ये समाज में नई उर्जा भर्ती है, सुंदर लघुकथा के लिए बधाई हो "
Aug 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"       आदरनीय रचना जी , अगर  बदलते समाज के साथ  हम नहीं बदलते तो , मुझे लगता है , हम मानसिक तौर पे बीमार हो जाते , जिस कारण ज़िन्दगी  जीने का क्या मतलब , जिंदगी हमारी और जीना दूसरों मर्जी से . सुंदर लघुकथा के ली…"
Aug 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"  आदरनीय विनय जी , लघुकथा के अंत में जो कहा गया , व्ही सच है , हमारी मन की हालत ही इस के लिए जिमेवार है, हमें समय के साथ चलने के लिए सोच को भी बदलना होगा , मुबारकबाद जी "
Aug 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"      आदरनीय मनन जी, मुझे लगता है , हम इक दुसरे से खुल कर बात करना भूलते जा रहे हैं  जब कोई बोलना भी चाहता , उस के अरमान अंदर ही रह जाते , हमारा ध्यान , मोबाइल , टी वी की तरफ चला जाता है , कभी शांत मन हो तो बात हो , ऐसा ही लघुकथा…"
Aug 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"           तेजवीर जी , हम घरों में कैसी ज़िन्दगी जी रहें , अब तो समझ से बाहर हो रहा है , हमें खरीदी गई चीज़े प्यारी हैं , एन के कारण हम रिश्तों को तोड़ रहें हैं , जिन का कोई मोल नहीं दे सकता , इसे मैं आज के मनुष्य की…"
Aug 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-77
"    सुबह सैर कर रहा था, इक आवाज़ मेरे कानों से टकराई, साहिब जी नमस्कार। उस ने आज बहुत सुंदर लाल कमीज़, काली ऐनक और सिर पर टोपी रखी हुई थी। धीरे से उस ने मेरे पास ट्राई साइकिल लाते हुए कहा, "साहिब जी, आज भोले नाथ का दिन है, आज कुछ हो…"
Aug 30
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"सर जी , बहुत शुक्रिया "
Aug 28
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-134
"    ये आंखें क्यूं हैं वो बेताब देखने के लिए । अगर ये घर मेरे महताब देखने के लिए । सवाल बन कि रही, जिंदगी बता न ज़रा ,लगे हैं पर कभी सुर्खाब देखने के लिए। यही तो सोच हकीकत मिला हूं अब मैं तुझे, "मुझे वो दे गया इक ख़्वाब देखने के…"
Aug 28
मोहन बेगोवाल posted a blog post

ग़ज़ल

नहीं आती हिसाबों में सताती हैं तेरी यादें।भला ये साथ कैसा जो बताती हैं तेरी यादें।'.संभालोगे कहां खुद को गिराने आ गये जब वो,उठाना हाथ रोको जो सुनाती हैं तेरी यादें।.ऐ इंसाँ अब न इतना भी ज़माने का हो कर रहना,ज़रा दिल झाँक देखा याद आती हैं तेरी यादें।.बनाई जिंदगी मेरी कहानी जो सुना देते,अगर भटके सफ़र में क्यूँ जताती हैं तेरी यादें।.ये दिल चाहे कहूं कोई ग़ज़ल अब प्यार में तेरे,मगर अंदर ही फिर क्यूँ ये दबाती हैं तेरी यादें।.समंदर पास आने पे कहाँ फिर साथ दरिया का,जो पानी बन रहा मेरा रूलाती हैं तेरी…See More
Apr 1
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-129
" आदरनीय गंगा धर जी , नए तरह के विषय को ग़ज़ल में उठाया गया है . "
Mar 27
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-129
" आदरनीय दिनेश जी , आप जी दी ग़ज़ल अच्छी लगी , बाकी उस्ताद जी ने खामिया बारे बता दिया , जिस में मुझे भी सीखने को मिला "
Mar 27
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-129
" आदरनीय dandpani nahak ,  शुक्रिया जी "
Mar 27

Profile Information

Gender
Male
City State
Amritsar
Native Place
Begowal
Profession
Medical Teacher
About me
Gazalgo , Punjabi Writer

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कीमत

 आज जब सुबह मैं सैर कर रहा था , तब इक आवाज़ मेरे कानों से टकराई ,साहिब जी नमस्कार ।

मैंने खुद को रोका और उस पर नज़र डाली, आज उसने बहुत सुंदर लाल कमीज़,काली ऐनक और सिर पे टोपी पहनी हुई थी ।

धीरे से उस ने अपनी ट्राई साइकिल मेरे पास लाते हुए कहा,"साहिब जी, आज भोले नाथ का जन्मदिन है ,आज कुछ हो जाए,ये मुझे समझ आ गया था ।"क्योंकि वह जब भी मुझे मिलता, उस को उम्मीद होती कि मैं उसे कुछ पैसे दूं।"

"नहीं भाई, आज शिव रात्रि नहीं, भाई आज तो जन्माष्टमी है ।"

"मैंने उस की ट्राईविलर के…

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Posted on September 1, 2021 at 5:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल

नहीं आती हिसाबों में सताती हैं तेरी यादें।

भला ये साथ कैसा जो बताती हैं तेरी यादें।'

.

संभालोगे कहां खुद को गिराने आ गये जब वो,

उठाना हाथ रोको जो सुनाती हैं तेरी यादें।

.

ऐ इंसाँ अब न इतना भी ज़माने का हो कर रहना,

ज़रा दिल झाँक देखा याद आती हैं तेरी यादें।

.

बनाई जिंदगी मेरी कहानी जो सुना देते,

अगर भटके सफ़र में क्यूँ जताती हैं तेरी यादें।

.

ये दिल चाहे कहूं कोई ग़ज़ल अब प्यार में तेरे,

मगर अंदर ही फिर क्यूँ ये दबाती…

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Posted on April 1, 2021 at 2:00pm

ग़ज़ल

2122 -1122-1122-22

याद तेरी को ऐसे दिल में लगा रक्खा है ।

ढूंढ  पाये  तेरा तो  जेब    पता रक्खा है ।1

 

रात  सो जाये हमें नींद कहाँ आती अब ,

साथ रातों यही  रिश्ता जो  बना रक्खा है ।2

 

क्यूँ बता दी कोई अपनी  ये कहानी उसको ,

बन  रहे   फूल  जो क्यूँ  शूल बता  रक्खा है।3

 

कल मिरा आज बिगाना वो  किसी कल  होगा

किस लिए यार  यूँ ही खुद को जला रक्खा है ।4

 

था कभी खोजा जिसे ऊँचे पहाड़ों जा कर ,

नेक बंदे…

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Posted on November 24, 2020 at 4:30pm — 1 Comment

सोच का सफ़र (लघुकथा )

जब मैं कल रात ड्यूटी से घर आई , तो महाभारत घर में पहले से ही हमेशा की तरह चल रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि जब घर वालों ने अपनी मर्जी से मेरी शादी की, मेरी राय तक नहीं पूछी गई l क्यूंकि मेरे जैसी जो पहले ही तीस पार कर चुकी होl उन से भला कौन राय लेता l मैं तो बोझ थी, जिसको निपटाना चाहा l जानलेवा बीमारी ने शादी के कुछ महीनों बाद ही उनको मुझसे जब दूर कर दिया। तब मुझे लगा, अब मुझे उस घर में एक अजनबी की तरह नहीं रहना चाहिए, मैं जल्दी से उनका बोझ कम करना चाहा। उनके जाने के बाद, मैं उस घर में अकेले…

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Posted on November 4, 2020 at 9:30pm — 3 Comments

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At 5:28pm on January 10, 2018, dandpani nahak said…
आदरणीय मोहन जी
बहुत बहुत शुक्रिया
At 9:08pm on March 1, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

जन्म दिन की हार्दिक बधाई, ईश्वर आपको प्रत्येक क्षेत्र में सफल करें ......

At 8:14pm on September 5, 2013, mrs manjari pandey said…

       

      आदरणीय मोहन बेगोवाल जी आपको शेर पसन्द आये . मै कृतार्थ हुई

 
 
 

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