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मोहन बेगोवाल
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मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"    आदरणीय महेंद्र जी, मेरी लिखी रचना को बहुत ही सुंदर ढंग सुंदर बनाने के लिए , धन्यवाद जी  "
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"    आदरणीय ओम प्रकाश जी, लघु कथा पसंद करने के लिए धन्यवाद "
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"        आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी, बहुत ही सुंदर लघु कथा को अच्छे ढंग से कहने की बधाई कुबूल करें  "
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"आदरनीय टी०आर० शुक्ल जी, बहुत ही सुंदर लघुकथा के तरीके से कही कहानी के लिए बधाई"
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"आदरनीय ओमप्रकाश जी, बहुत सुंदर लघुकथा के लिए बधाई"
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"      आदरनीय  Sheikh Shahzad Usmani जी, बहुत ही सुंदर लघु कथा के लिए बधाई "
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"आदरनीया प्रतिभा जी,मेरी लघुकथा को पसंद करने के लिए बहुत शुक्रिया जी"
Oct 31
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"      आज कलघर के गेट का दरवाज़ा अंदर से बिना लाँक लाए ही वह सोफा पर आ कर बैठ गया। पहले वह आठ बजे खाना खा कुछ पल चहल पहल करने के बाद बिस्तरे पर आ कर लेट जाता था। लेटते धीरे से तब नींद आ कर अपने क़ाबू में ले लेती थी। मगर अब घड़ी की दोनों…"
Oct 30
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-43 (विषय: "आजकल")
"       आज कलघर के गेट का दरवाज़ा अंदर से बिना लाँक लाए ही वह सोफ़ा पर आ कर बैठ गया। पहले वह आठ बजे खाना खा कुछ पल चहल पहल करने के बाद बिस्तरे पर आ कर लेट जाता था। लेटते धीरे से तब नींद आ कर…"
Oct 30
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
"   शिज्जू भाई जी , बहुत शुक्रिया जी "
Oct 20
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
"प्यार  ऐसे  भुला  गया है मुझे। कोई दिल से चुरा गया है मुझे। है अगर यार शायरी जो कही, हुनर चोरी सिखा गया है मुझे। वक्त करता मज़ाक साथ लगा, “सब्र करना तो आ गया है मुझे।” जीत होती दिखी नगर की जब, वो सियासत बना गया है…"
Oct 20
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
"                प्यार ऐसे  भुला  गया  है  मुझे।  कोई  दिल से चुरा गया है मुझे।    है  अगर  यार शायरी जो कही, हुनर चोरी  सिखा गया  है…"
Oct 20
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
" आदरनीय समर जी, बहुत ही सुंदर शायरी की मुबारकबाद "
Oct 20
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
" आदरनीय शिज्ज्जू जी, दूसरी उम्दा ग़ज़ल के लिए भी मुबारकबाद कुबूल करो "
Oct 20
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
" आदरनीय रवि सर जी , बहुत सुंदर ग़ज़ल और समर जी  टिपणी के लिए बधाई "
Oct 20
मोहन बेगोवाल replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
" आदरनीय नमन जी, बहुत सुंदर ग़ज़ल की बधाई हो "
Oct 20

Profile Information

Gender
Male
City State
Amritsar
Native Place
Begowal
Profession
Medical Teacher
About me
Gazalgo , Punjabi Writer

मोहन बेगोवाल's Blog

मुजरिम : लघुकथा

आठवीं कक्षा तीसरा पीरीयड नैतिक शिक्षा का चल रहा था। जिंदगी अच्छे से कैसे गुजारी जाए के बारे सवाल मैडम से बच्चे पूछ रहे थे। मैडम सोचती है कि ऐसे सवाल तो हम ने भी पूछे थे,मगर हमारी जिंदगी का हिस्सा क्यूँ नहीं बने, वह सोचने लगी।

अब यही सवाल बच्चे उन से पूछ रहे हैं। क्या ऐसे करने से तबदीली आ सकती व्यहार से मैडम ने अपने आप से सवाल पुछाा।

"मगर जब वह जवाब की कौशिश करती है तो वह सोचती है क्यूँ न हम कहने की जगह करने को कहें,मगर ये तो तभी होगा जब हम खुद करेंगे,उस ने अपने सवाल का खुद को…

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Posted on July 25, 2018 at 2:00pm — 4 Comments

पर्दा (लघुकथा)

पर्दा

हर समय मुस्कराता चेहरा, और दूसरों के चेहरे पे मुस्कराहट बिखेर देना उस का बाएँ हाथ का काम था।

कई बार मैं खुद छुप कर आईने के सामने उस जैसा मुस्कराने की कोशिश करता, मगर असफल रहता ।

तब खुद को कहता “क्या कमी है, अगर मैं मुस्करा दूँ तो कौन सा पहाड़ गिर जायेगा ?”

मगर कल शाम से सारा मौहला उदास नज़र आ रहा था ।

किसी ने आकर बताया कि सुबह के दस बज गए, अभी तक दरवाज़ा नहीं खुला था।

मैं और भी उदास हो गया,पता नहीं चल रहा ऐसा क्यूँ हुआ।

तब मेरे कानों में इक आवाज़ सुनाई… Continue

Posted on May 12, 2018 at 6:18pm — 5 Comments

अपनत्व की खुशबु (लघुकथा )

शहर के बड़े शिवपुरी में उस कि अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, इस शिवपुरी में मैं कई बार अंतिम संस्कारों में शामिल हो चूका था| मगर जिस तरह का हजूम आज राजेंद्र मास्टर के साथ आया था, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा था| सभी आंखें नम थी और इधर उधर चारों तरफ चीकें सुनाई दे रही थी किसी को उसके इस तरह जाने पे यकीन नहीं हो रहा था| 

कोई ये कह रहा था, “क्या ऐसा भी हो सकता है, मगर दुर्घटना कब, कहाँ हो जाए कहाँ पता चलता है इसके बारे कोई कुछ नहीं कह सकता”|

“मगर बचातो जा सकता है, इसके लिए प्रबंध तो…

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Posted on May 11, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

अधूरा रिश्ता (लघुकथा)

वार्ड के बिस्तर पर वह निढ़ाल पड़ा है, डॉक्टर कह रहे हैं कि ये नीला पड़ गया है, उन्होंने पुलिस को भी बुला लिया है |

“नीला तो पैदा होते समय ही था, अब क्या होगा ?”, किसी पास खड़े ने कहा | 

बात निकलती हुई इस पर आ कर रुक गई, सुबह तो नए कपड़े पहन और चौर बाज़ार से खरीदी काली एनक लगा कि गया था 

काले चश्में का एक फायदा तो ये था कि आंख का टीर भी नजर नही आता था |

अभी कुछ दिन हुए घर वाली रब को प्यारी हो गई थी | 

कुछ…

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Posted on May 4, 2018 at 10:30pm — 5 Comments

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At 5:28pm on January 10, 2018, dandpani nahak said…
आदरणीय मोहन जी
बहुत बहुत शुक्रिया
At 9:08pm on March 1, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

जन्म दिन की हार्दिक बधाई, ईश्वर आपको प्रत्येक क्षेत्र में सफल करें ......

At 8:14pm on September 5, 2013, mrs manjari pandey said…

       

      आदरणीय मोहन बेगोवाल जी आपको शेर पसन्द आये . मै कृतार्थ हुई

 
 
 

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