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मोहन बेगोवाल's Blog (47)

सयाने लोग

" वो लोग भी कमाल के होते हैं, जो कमाल की बाते करते हैं ।",उनकी मीटिंग खत्म होने के बाद पास बैठे आदमी ने कहा

"पर इन लोगों ने कभी चुप शांत रहने वाले लोगों के बारे भी सोचा है, वो भी कुछ दायरे संभाल रखें हैं ।" , उसने ख़ुद से पूछा

चुप व शांत रहने वालों की भी उन्हें प्रवाह करनी चाहिए, जब वे लोग आपस में बातें कर रहे होते हैं ।

"पर उनके लिए ये जानना भी ज़रूरी है कि इनकी सोच के दायरे से बड़ा भी कोई किसी का दायरा हो सकता है ।"

वहाँ बैठे आदमी ने फिर पूछ ही लिया, " भाई साहिब, आप जो…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 3, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

औरत : दर ब दर (लघुकथा )

विभाग की तरफ से सर्वेक्षण का काम पूरा होने के बाद, जूनियर स्टॉफ सदस्यों को विश्लेषण का काम दिया गया। जो टीम इस काम में लगाई गई, उस में एक पुरुष और महिला को चुना गया। विश्लेषण कर रहे जूनियर स्टॉफ के मन में परिणाम देख कर कुछ सवाल पैदा हो गए थे। जिन के बारे वह वरिष्ठ सदस्यों से पूछना चाहते थे। दो दिन के बाद वरिष्ठ स्टॉफ सदस्यों के सामने जब सर्वेक्षण का परिणाम रखा गया। तब पहला सवाल जो उन्होंने पूछा कि "एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं में पुरुषों की तुलना महिला शिशुओं की संख्या अधिक कैसे हो गई और वह…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 1, 2019 at 10:39am — 1 Comment

जहाँ ये कर दिखाना होगाl

जहाँ ये कर दिखाना होगाl

हमारे  दिल   बताना होगा l

करोगे  बात जैसी  तुम भी  ,

सवालों को उठाना होगा l

सुनी  जो  भीड़ तूने   गाती  ,

मिरे दिल का फ़साना होगा l

ख़बर जाती  कहानी…

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Added by मोहन बेगोवाल on September 30, 2019 at 7:00pm — 2 Comments

है ख़ाक काम किया तूने जिंदगी के लिए।

है ख़ाक काम किया तूने जिंदगी के लिए।

मुनीर जब किया दीया न रौशनी के लिए।

बताई जो मेरी माँ ने वही तो मैं भी कही,

अ़मल कहाँ हुआ बस बात शायरी के लिए।

फ़िराग कब मिली जब ये है जिंदगी झमेला,

नसीब कब हुआ वो चाँद आशिकी के लिए।

ख्याल ढूँढ रखा जो बता सकूँ मैं तुझे,

रखी ये चीज़ जो है खास आप ही के लिए।

ख़ता कभी न हो ऐसा कहाँ लिखा है बता,

तभी हुई है कहानी ये आदमी के लिए ।

फ़जा तलाश जहाँ में कहीं यहाँ या…

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Added by मोहन बेगोवाल on July 23, 2019 at 12:00pm — 1 Comment

इक कदम (लघुकथा)

गाड़ी रूकते ही मैं ढाबे की तरफ़़ बढ़ा। कुर्सी पर बैठते हुए छोटू को पास बुलाया।

उस से बात करने लगा, जैसे अक्सर ही मैं ऐसा   करता हूँ, ऐसा करना मेरा काम है, किसी को अच्छा या नहीं लगता।  ये जानना मेरा काम नहीं ।"

“आप इन से क्या बात करते हो?" दूसरी तरफ बैठे मालिक ने उठ कर बालो से उस  पकड़ा अंदर की ओर ले कर जाते हुए कहा

 आप को यहाँ काम के लिए रखा है, बातों के लिए नहीं।

"भाई साहिब,कुछ लेना है,आप ने।" उसने मेरी तरफ 

देखते हुए कहा

“नहीं,बात करनी है,इस और आप से।"…

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Added by मोहन बेगोवाल on June 2, 2019 at 4:30pm — 6 Comments

जो पतंगों को उड़ाता है।

जो पतंगों को उड़ाता है।
डोर खुद भी छोड़ जाता है।
जख्म सबको दिखाना मत,
हर न मरहम इस लगाता है।
पास आकर बैठ जाये जो,
क्यूँ वो आसूँ फिर छुपा ता है।
क्या हुआ देखों अँधेरे को,
बीज सपने क्यूँ चुराता है।
कलम कैसी भी रही होगी,
सोच अक्सर वो लिखाता है।
“मौलिक व अप्रकाशित

Added by मोहन बेगोवाल on January 14, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल

पास  रखना है भला जो।
छोड़ देेेेना दिल जला  जो।

क्या मनाये वो  खुशी को,
खुद मनाने  दिल चला जो।

रौशनी हम तब  मिली है ,
रात भर  दीया जला जो।

आम का   बन  खास  जाना,
कुछ तो अच्छा दिन ढला जो।

रोज़   कहता   मुझ  बता दे
राज़  उस  खोला  भला जो।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by मोहन बेगोवाल on January 2, 2019 at 5:00pm — 3 Comments

मुजरिम : लघुकथा

आठवीं कक्षा तीसरा पीरीयड नैतिक शिक्षा का चल रहा था। जिंदगी अच्छे से कैसे गुजारी जाए के बारे सवाल मैडम से बच्चे पूछ रहे थे। मैडम सोचती है कि ऐसे सवाल तो हम ने भी पूछे थे,मगर हमारी जिंदगी का हिस्सा क्यूँ नहीं बने, वह सोचने लगी।

अब यही सवाल बच्चे उन से पूछ रहे हैं। क्या ऐसे करने से तबदीली आ सकती व्यहार से मैडम ने अपने आप से सवाल पुछाा।

"मगर जब वह जवाब की कौशिश करती है तो वह सोचती है क्यूँ न हम कहने की जगह करने को कहें,मगर ये तो तभी होगा जब हम खुद करेंगे,उस ने अपने सवाल का खुद को…

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Added by मोहन बेगोवाल on July 25, 2018 at 2:00pm — 4 Comments

पर्दा (लघुकथा)

पर्दा

हर समय मुस्कराता चेहरा, और दूसरों के चेहरे पे मुस्कराहट बिखेर देना उस का बाएँ हाथ का काम था।

कई बार मैं खुद छुप कर आईने के सामने उस जैसा मुस्कराने की कोशिश करता, मगर असफल रहता ।

तब खुद को कहता “क्या कमी है, अगर मैं मुस्करा दूँ तो कौन सा पहाड़ गिर जायेगा ?”

मगर कल शाम से सारा मौहला उदास नज़र आ रहा था ।

किसी ने आकर बताया कि सुबह के दस बज गए, अभी तक दरवाज़ा नहीं खुला था।

मैं और भी उदास हो गया,पता नहीं चल रहा ऐसा क्यूँ हुआ।

तब मेरे कानों में इक आवाज़ सुनाई… Continue

Added by मोहन बेगोवाल on May 12, 2018 at 6:18pm — 5 Comments

अपनत्व की खुशबु (लघुकथा )

शहर के बड़े शिवपुरी में उस कि अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, इस शिवपुरी में मैं कई बार अंतिम संस्कारों में शामिल हो चूका था| मगर जिस तरह का हजूम आज राजेंद्र मास्टर के साथ आया था, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा था| सभी आंखें नम थी और इधर उधर चारों तरफ चीकें सुनाई दे रही थी किसी को उसके इस तरह जाने पे यकीन नहीं हो रहा था| 

कोई ये कह रहा था, “क्या ऐसा भी हो सकता है, मगर दुर्घटना कब, कहाँ हो जाए कहाँ पता चलता है इसके बारे कोई कुछ नहीं कह सकता”|

“मगर बचातो जा सकता है, इसके लिए प्रबंध तो…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 11, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

अधूरा रिश्ता (लघुकथा)

वार्ड के बिस्तर पर वह निढ़ाल पड़ा है, डॉक्टर कह रहे हैं कि ये नीला पड़ गया है, उन्होंने पुलिस को भी बुला लिया है |

“नीला तो पैदा होते समय ही था, अब क्या होगा ?”, किसी पास खड़े ने कहा | 

बात निकलती हुई इस पर आ कर रुक गई, सुबह तो नए कपड़े पहन और चौर बाज़ार से खरीदी काली एनक लगा कि गया था 

काले चश्में का एक फायदा तो ये था कि आंख का टीर भी नजर नही आता था |

अभी कुछ दिन हुए घर वाली रब को प्यारी हो गई थी | 

कुछ…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 4, 2018 at 10:30pm — 5 Comments

पिता पुत्र(लघुकथा)

सतवंत पहले से ही मेरे साथ इस के बारे में बात कर चूका था। लेकिन जिस दिन से उसने मुझसे बात की थी, कोई भी पुराना साथी उसके पास नहीं आया और न ही वह किसी को मिलने गया था। मगर उस दिन से घर के लोगों ने उस से बात करना बंद कर दी थी ।

हद तो उस रोज़ हो गई जब इक दिन बाप हाथ में जूती ले कर सतवंत के पीछे दौड़ पड़ा और ये ध्यान भी नहीं किया के लोग क्या कहेंगे, तब सतवंत को लगा था कि इस जिंदगी का क्या फायदा जब बीस को पार कर चुके बच्चे पे माँ बाप को यकीन न रहे , तब कोई और क्या करे ? बड़े भाई से सतवंत ने फोन…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 2, 2018 at 7:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल

तू  दर्द से मिलें  हो ये  दौलत  कहाँ कहाँ                     

रहती है प्यार को  भी  शिकायत कहाँ कहाँ

             

दुनिया  बदल  गई  कोई हमको  बता गया                    

मिलती है बोल सोच कि वहशत कहाँ  कहाँ

             

जब  अब   बहा र हो न  हमारे  नसीब  में                   

फिर और  हम बता दो तिजारत कहाँ कहाँ

                    

हम भी तलाश हार  गये  जो     मिला नहीं                   

पाने    को  उस करी न  इबादत कहाँ…

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Added by मोहन बेगोवाल on July 30, 2017 at 9:50am — 1 Comment

विरासत (लघुकथा )

   

विरासत (लघुकथा )

सुबह पढ़ी कहानी से महेंद्र बहुत प्रभावित हुए |

वह चाहते थे कि घर का हर सदस्य भी इसे पढ़ें क्यूंकि इस कहानी में लेखक ने जो बताने की कोशिश की है |

वे आज के दौर के बारे में है जो हमारी आने वाली जिंदगी  को कैसे प्रभावित करेगी के बारे में है |

घर के सदस्य टेलीविज़न देख रहे हैं |

मगर सब से छोटी लड़की सौफे पे बैठी पढ़ रही है |

महेंद्र इस कहानी को पढ़ने के लिए, उसे देना चाह रहा है |

क्यूंकि के उसकी लाइब्रेरी में कई किताबें हैं, मगर वे सब…

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Added by मोहन बेगोवाल on June 19, 2017 at 3:30pm — No Comments

झूठ का साया(लघुकथा)

                       

महिंद्र की सेवानिवृत्ति पार्टी शुरू हो गई | विभाग के कर्मचारियों के साथ महिंद्र के करीब के रिश्तेदार भी आ कर हाल में  बैठ गए | थोड़ी देर बाद साहिब  भी आ गए | साहिब और कार्यालय के कर्मचारियों ने महिंद्र और उसकी पत्नी को आगे पड़ी कुर्सियों पे बिठाया और उनके गले में हार डाले और उनको गिफ्ट दिए |

इसी समय सब को भोजन परोसा गया और सभी ने खाना शुरू किया, समारोह के चलते, कुछ लोगों को महिंद्र के बारे में कुछ कहने के लिए क्रमवार बुलाया गया |

मगर सभी…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 28, 2017 at 6:02am — 4 Comments

ड्रामा और हकीकत(लघुकथा)

गेट के सामने भीड़ इकठ्ठी हो रही है, कुछ लोग क्रोध से भर कार्यालय के अंदर जाने की कोशिश कर रहे हैं । द्वारपाल भीड़ को रोकने की कोशिश में नकाम हो रहा है।

प्रेस अपने वीडियो कैमरे के साथ कार्यालय तक पहुँच गई है, और पत्रकार कई तरह के सवाल पुछ रहे हैं जैसे “वार्ड नं ३ में होने वाली मौत के बारे आप क्या कहना चाहेंगा। आप बताएँ मौत कि लिए जिम्मेदार चिकित्सक पर क्या एकशन लिया गया है।“

"आप कैसे कह सकते हैं कि मौत के लिए चिकित्सक ही जिम्मेदार है ?" बड़े टेबल की दुसरी तरफ़ बैठे साहिब ने कहा। मैने…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 15, 2017 at 4:30pm — 6 Comments

बंद दरवाज़े (लघुकथा )

“आंटी जी, अगर उस दिन आप ने मेरे सर पर हाथ न रखा होता तो पता नहीं मैं कहाँ होती”

“कीमत तो वो मेरी पहले ही लगा चुके थे,उस रोज़ तो बस पैसे देने ही आए थे ”।

“मुझ को तो कुछ पता ही नहीं चलने दिया था”  ऋतू ये कहती जा रही थी।

“ये तो भला हो, मेरे साथ डांस पार्टी में काम करने वाली सुनीता का,

 "उस बता दिया मुझको  कि  मालिक तो मेरे पैसे ले रहा  हैं, कल तुम किसी और डांस पार्टी में काम करोगी "

  "तब मुझे आप के पास तो आना ही था, आंटी जी" 

 “घर से तो अमली ने  पहले ही…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 10, 2017 at 12:30pm — 8 Comments

लिस्ट में नाम (लघुकथा)

                                                       

 

लिस्ट में से नाम और पता लेकर अमर ने खुद को विजट पर जाने के लिए तैयार कर लिया मोटर साइकल स्टार्ट कर वो सलेमपुर की तरफ निकल पड़ा।

अपना प्रोग्राम उसने ऐसे तैयार किया था कि कम से कम तीन कैंसर पीड़ित मैंबर के किसी फैमली मैंबर से वह मिल सके ।

चलने से पहले लिस्ट क्रम में इक नंबर पर महिंद्र कौर के घर वालों की तरफ से दिए गए नंबर पर उसने फौन लगाया ऐसा करना इस लिए भी जरूरी था कि कोई घर मिल जाए खास करके वह आदमी…

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Added by मोहन बेगोवाल on April 25, 2017 at 5:13pm — 1 Comment

हार गई जिंदगी (लघुकथा)

  

हार गई जिंदगी

चार दिन से ऋचा ड्यूटी पर नहीं जा रही थी, बुखार के साथ शरीर में लाल्गी आने से परेशानी और बढ़ गई थी जिस कारण अब बिस्तर से उठकर चलना भी मुश्किल हो रहा था।

प्रशिक्षण दौरान पढ़ाया गया था कि अगर माता रानी की क्रोपी बढ़ी ऊम्र में हो जाए तो रोग जानलेवा भी हो सकता है ।

यह बात वह पति परमेशर कई बार बता चुकी थी, लेकिन अभी तक कोई जवाब उसके द्वारा नहीं मिल रहा था इक बार ऋचा ने कहा कि वह माँ के घर जा आती है, लेकिन सासू माँ ने इनकार कर दिया…

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Added by मोहन बेगोवाल on April 24, 2017 at 5:00pm — 1 Comment

भीख और हक (लघुकथा)

कारपोरेशन की गाड़ी का हूटर बजा और लड़के ने गाड़ी से उतर कर डोर बैल बजाईं, जब मैं घर से बाहर आया तो मल्होत्रा ​​साहिब अपने घर में रखा कूड़ेदान लेकर बाहर आ उस लड़के की तरफ  बढ़ रहे थे ।

"हमारा कूड़ा सुबह सुबह पुराना रेहड़ी वाला ही उठा कि ही ले जाता है" ।

क्योंकि आप तो बहुत देर से आते हैं ।

जब आते हैं तब कोई भी घर नहीं होता "मैने कहा, बच्चे स्कूल व् हम दोनों ड्यूटी जा चुके होते हैं ।

पर वह लड़का अभी भी गेट के पास ही…

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Added by मोहन बेगोवाल on April 15, 2017 at 11:00am — 3 Comments

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