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पास  रखना है भला जो।
छोड़ देेेेना दिल जला  जो।

क्या मनाये वो  खुशी को,
खुद मनाने  दिल चला जो।

रौशनी हम तब  मिली है ,
रात भर  दीया जला जो।

आम का   बन  खास  जाना,
कुछ तो अच्छा दिन ढला जो।

रोज़   कहता   मुझ  बता दे
राज़  उस  खोला  भला जो।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by राज़ नवादवी on January 6, 2019 at 1:42pm

आदरणीय मोहन बेगोवाल जी, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है. बधाई स्वीकार करें, बाक़ी मंच के असातिज़ा से मिली राय पे अमल कर लाभान्वित हों. सादर 

Comment by Mahendra Kumar on January 4, 2019 at 7:44pm

आदरणीय मोहन बेगोवाल जी, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. रदीफ़ से कई जगह न्याय नहीं हो पाया. देखिएगा. सादर.

Comment by Samar kabeer on January 3, 2019 at 5:37pm

जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ,लेकिन ग़ज़ल में भाव स्पष्ट नहीं हैं और :-

'फूल बन कैसे खिला जो'

इस शैर में क़ाफ़िया ही बदल गया है ,देखियेगा ।

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