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आठवीं कक्षा तीसरा पीरीयड नैतिक शिक्षा का चल रहा था। जिंदगी अच्छे से कैसे गुजारी जाए के बारे सवाल मैडम से बच्चे पूछ रहे थे। मैडम सोचती है कि ऐसे सवाल तो हम ने भी पूछे थे,मगर हमारी जिंदगी का हिस्सा क्यूँ नहीं बने, वह सोचने लगी।

अब यही सवाल बच्चे उन से पूछ रहे हैं। क्या ऐसे करने से तबदीली आ सकती व्यहार से मैडम ने अपने आप से सवाल पुछाा।
"मगर जब वह जवाब की कौशिश करती है तो वह सोचती है क्यूँ न हम कहने की जगह करने को कहें,मगर ये तो तभी होगा जब हम खुद करेंगे,उस ने अपने सवाल का खुद को जवाब दिया।"
कुछ बच्चे मैडम की तरफ और कुछ अपनी कापी किताबों में नज़र टिकाये हुए।
अचानक ही कक्षा का माहौल बदल गया।
कुछ देर से सर नीचे करे बैठी ज्योति ने अचानक अजीब सी हरकतें शूरू कर दी।
सभी बच्चों का ध्यान उस की तरफ गया।
ऐसा होते ही मैडम उस के पास आई, और इक दम खुद में हैरान हो गई।
“बच्चो, इसे मैडीकल रूम में ले चलो”,मैडम ने कहा
बच्चे ज्योति को पकड़ मैडीकल रूम में छोड़ बाहर आए ।
तभी मैडम ने ज्योति से पुछा, “क्या तूने नशा लिया है।“
“हाँ, ली  है, अगर आप कहती हैं तो, मैडम जी”।
“आप को ऐसा नहीं करना चाहिए।“
“आप ने कहाँ से लिया, मैडम ने फिर सवाल किया
“घर से”
“आप को पाठशाला से निकाल दिया जायेगा। अगर मुख्य आधियापका को पता चल गया तो।" मैडम ने कहा

“क्यूँ” मुझे क्यूँ ?
“तूने जुर्म किया है।“
“मगर इसकी मुजरिम तो मैं नहीं हूँ”
“कौन है,मुजिरम,मेरा बाप और आप सब, घर लाता है, जो मेरा बाप।

रोटी चाहे लाये या न ये तो आता है।“
“घर में है तो क्या लेना चाहिए”,मैडम ने कहा
“अगर घर में होगा तो दिल कर ही जाता है।“
“मैंने भी ले लिया, ये तो मुझे पता नहीं लेना चाहिए या नहीं ।“ अगर कोई चीज़ बाज़ार में होगी और घर आयेगी तो बच्चों को आदत इसकी होगी।
ये आप बतायें मैडम जी और वह उसकी आँखों में जवाब तलाशने लगी, अपने सवाल का।
जवाब न मिलता देख वह बंद दरवाजे़ की तरफ़ देखने लगी।

मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 29, 2018 at 2:24pm

विषय की सार्थकता को लेकर लघुकथा अच्छी लगी आदरणीय..बाकी आदरणीय समर जी और आदरणीय तेजवीर सिंह जी से मैं भी सहमत हूँ..

Comment by TEJ VEER SINGH on July 26, 2018 at 4:15pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मोहन जी।बेहतरीन प्रयास। आपने विषय तो बढ़िया लिया है लेकिन आप उसे सही तरीके से निभा नहीं पाये।थोड़ा मेहनत करें तो एक बेहतरीन लघुकथा निकल आयेगी।सादर।

Comment by Samar kabeer on July 26, 2018 at 11:59am

जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब,लघुकथा का कथानक अच्छा है लेकिन कसावट की कमी है, संवाद भी सटीक नहीं,इस प्रयास पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by babitagupta on July 25, 2018 at 7:15pm

यह सही ही हैं,नशा करने का सामन हर स्थिति के घर में होता हैं,फर्क सिर्फ इतना होता हैं कि उच्च घरानों में शो केस की आड़ में छिपा रहता हैं और निम्न घरों में खुले आम.नशे के आदि दोनों घरों के बच्चे होते हैं.सही कटाक्ष किया गया हैं,नशे के आदि हम परिवार के लोग ही बनाते हैं.बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा ,आदरणीय मोहन सरजी।

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