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ज़िन्दगी - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

अरकान -  212  212  212  212

हो के मुझसे तू ऐसे खफ़ा ज़िन्दगी |

जा बसी है कहाँ तू बता ज़िन्दगी|

 

जग को ठुकरा दिया मैंने तेरे लिए,

कर न पायी तू मुझसे वफ़ा ज़िन्दगी|

 

तेरी सूरत ही थी मेरा दर्पण सदा,

तू मिले फिर सजूँ इक दफा ज़िन्दगी|

 

तू हंसाती भी है और रुलाती भी है,

तू दिखाती है क्या क्या अदा ज़िन्दगी|

 

पहले इतना बता क्या है मेरी ख़ता,

फिर जो चाहे तू देना सज़ा ज़िन्दगी|

 

मिस्ले महबूबा तुझको सजाऊंगा मै,

मुझसे होना कभी मत जुदा ज़िन्दगी|

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 12, 2015 at 12:21am

आदरणीय श्याम नारायण जी ..............बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Shyam Narain Verma on December 10, 2015 at 1:11pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर ग़ज़ल पर

कृपया ध्यान दे...

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