रात की सरहदें,
चाँद का दबदबा,
जिनको करने फ़तह,
है सुबह चल पड़ी
नींद के सब किले,
बाँध लो तुम ज़रा,
ख़्वाब की ज़िन्दगी,
अब बहुत कम बची
सुबह और रात में,
जंग लो छिड़ गयी,
क़त्लो-ग़ारत हुई,
रात फिर छट गयी,
लाश तारों की उफ़!,
ओस बन बिछ गयी,
रौशनी, रौशनी,
हर तरफ चढ़ गयी
जीत का जश्न फिर,
खूब दिन भर चला,
आसमां रौंद कर,
देखो सूरज चला,
कितना मगरूर था,
हाय! कितना गुमां,
उसको समझाया पर,
उसने इक न सुना
शाम आयी लो अब,
फिर से बदला समां,
धीरे, धीरे से फिर,
उसने तोडा गुमां,
रौशनी बट गयी,
रौशनी कट गयी,
जा के सागर में फिर,
जलता सूरज गिरा
रात जीती यूँ फिर,
इस पलटवार में,
मयकदे सज गए,
सारे बाज़ार में,
महफ़िलों में उडी,
फिर से गम और ख़ुशी,
जाम में फिर बही,
देख लो ज़िन्दगी
देखते, देखते,
बस इसी जंग को
दिन से रातें हुई,
सुबह, शामें गयी,
साल गुज़रे कि ऐसे,
पता ना चला,
उम्र बातों ही बातों में,
बस कट गयी
ज़िन्दगी के परे,
सुन ले मेरे खुदा,
मुझको करना मुहैय्या,
तू ऐसी जगह,
शाम हो इक तरफ,
इक तरफ हो सुबह,
रात दिन साथ हो,
और हँसें आसमां
"मौलिक व अप्रकाशित"
Comment
आदरणीय समर जी, शहज़ाद जी, बहुत बहुत शुक्रिया :)
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