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हमको खबर है कितने, हम बेखबर हो गए
अपने ही घर से कितने बाशिंदे बेघर हो गए

जब हम एक थे तो सारा शहर एक था
जो राहें हुईं अलग हमारी तो सब कुछ बंट गया
और अब तो आलम ये है कि ये सारा शहर दो खेमों में बंट चुका है
आधे इधर हो गए आधे उधर हो गए
अपने ही घर से कितने बाशिंदे बेघर हो गए-2

हर महफिल में सन्नाटा है हर शै सूनी हो गई है
मंज़िल खोती जाती है राहें दूनी हो गई हैं
सदमे में हर कोई यहॉँ सदमे में उधर भी हैं
लफ़्ज़ शोला उगलते हैं आँखें खूनी हो गई हैं

कि इक बहुत बड़े मुल्क के बीचों बीच एक बहुत ऊंची दीवार बन गई है
और दीवार के बीचों बीच एक दरवाजा बनाया गया है
उसी दरवाजे से कुछ सुस्त कदम गुज़रते हैं
हाँ तेज़ गति में कुछ सुस्त कदम गुज़रते हैं
कुछ इधर से उधर जाते हैं
कुछ उधर से इधर आते हैं

वो दरवाजा भी बङा शातिर मिजाज़ी लगता है
कमबख़्त बस इंसानों का रस्ता रोक रहा है
इंसानी रिश्तों की चाश्नी में ज़हर-सा घोल रहा है
पंछी-नदियाँ, पवन के झोंके तो
बेरोक टोक दीवार को लांघ हवा और पानी के रस्ते
खुशबुएं दो साझा कर रहे हैं
दो नहीं वो खुशबुएं एक ही हैं,बस सियासी सूरमाओं ने नफरत का विष घोला है हवाओं में
और हैरत नहीं कि ये विष दोनों तरफ बनता है

कोई मसला नहीं बङा कोई आसमान नहीं फटा,बात बड़ी छोटी लगती है
किसी मासूम ने मानचित्र बनाने में जैसे कर दी कोई गलती है
अफसोस यही बस दिल को कचोटे,यही दर्द चुभता है
इस छोटी गलती की ज़द में कितने बेज़र हो गए
अपने ही घर से कितने बाशिंदे बेघर हो गए-2

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ashish Painuly on March 26, 2016 at 12:11pm
प्रतिक्रिया और प्रोत्साहन हेतु ह्रदय से आभार मोहित मिश्रा जी एवम् राजेश कुमारी जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 20, 2016 at 11:13am

इक छोटी  गलती  नहीं  कहेंगे इसको.. सोची समझी गलती हुई है खुदगर्ज सियासती चालों पर अच्छी प्रस्तुति दी है आपने हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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