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बिखर रहे हैं व्योम में, तरह तरह के रंग।
सबके भीगे अंग हैं, मन में भरी उमंग।।

होली के इस पर्व की, अद्भुत है हुड़दंग।
कोई नाचे राह में, कोई बाँटें भंग।।

चूँ चूँ चूँ चूँ गा रही, गौरैया भी गीत।
मैं भी बैठा सुन रहा, क्या कहती ये मीत।।

डी जे वाला शोर ये, मुझको नहीं पसंद।
जाने कौन बजा रहा, भद्दे भद्दे छन्द।।

मैल मिटा कर मेल कर, मन का निखरे रंग।
वर्ग विभाजन बन्द कर, बदलो अपने ढंग।।

हम लोगों के मेल में, भारत का सौभाग।
चलो बुझाई जाय अब, नफ़रत वाली आग।।

नये वर्ष की राह में, चलो बिखेरें फूल।
भाल तिलक करके चलें, इस धरती की धूल।।

जब तक देश स्वतंत्र है, हम तब तक आज़ाद।
वह वाणी मत बोल जो, करे देश बर्बाद।।

(दोहावली)

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 30, 2016 at 6:35pm
आदरणीय अमिता जी सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 30, 2016 at 9:28am
आदरणीय केवल प्रसाद सर सादर आभार
Comment by amita tiwari on March 27, 2016 at 6:13pm

उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 25, 2016 at 1:01pm

आ०  पंकज भाई जी,  बहुत सुंदर दोहे रचे हैं. -प्रयास के लिये बधाई स्वीकारें....अभी , कहीं-कहीं और मेहनत की जरूरत है...

//नये वर्ष की राह में, चलो बिखेरें फूल।
भाल तिलक करके चलें, इस धरती की धूल।।// .....  बात स्पष्ट नही हो पा रही है.

नये वर्ष की राह में, चलो बिखेरें फूल।
उसी राह पर हम चलें, मस्तक पर रख धूल।।.....सादर

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