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पहचान - लघुकथा

"बाऊजी, मैं तो बस इतना कहना चाहता हूँ कि आप घर से बाहर जाया करे तो कुछ अच्छे कपड़े पहन लिया करें।" कुछ ही दिन पहले गाँव से आये पिता को घर से बाहर सोसाइटी में निकलने के मद्देनजर बेटा समझा रहा था।
"पर बेटा, मेरे कपड़े पहनने लायक के साथ-साथ साफ़ सुथरे भी होते है और मैं नहीं समझता कि इस पहनावे के कारण तुम्हारे मान-सम्मान को कोई ठेस पहुँच सकती है।"
"बाऊजी अब कैसे समझाऊं आपको ? यहाँ हमारे गांव के लोग या हमारे गांव की चौपाल नहीं है....." बेटे ने अपने नजरिये से बात की विवेचना करनी चाही। "....हम शहर की सबसे प्रतिष्टित सोसाइटी में रहते है और यहां लोगो का जीवन स्तर, उनके रहन-सहन और पहनावे से ही आंका जाता है।"
"समझ गया बेटा !" पिता एक ठंडी सांस भरकर जरा सा मुस्करा दिए। "मेरा ये ठेठ पहनावा तुम्हारे समाज से मेल नहीं खा रहा न...., कोई बात नहीं। मैं तेरे समाज के लिए अपना पहनावा बदल लूँगा लेकिन बेटा मेरी एक बात तुम भी जरूर मान लेना।"
"क्या ...? ?" बेटे के चेहरे पर कई प्रश्न उभर आये।
"बेटा ! हो सके तो मेरी आखिरी साँसों में मुझे उसी चौपाल पर ले जाना जहाँ के लोगों ने कभी मेरे तन पर ओढे कपड़ो को नहीं देखा, बस हमेशा मुझे और मेरी पहचान को मान दिया......" अपनी बात पूरी करते करते पिता की आवाज लरजने लगी थी। ".... मैं नहीं चाहता यहां मेरी 'मिट्टी' की पहचान भी मेरे ऊपर डाली गयी 'शालों' से आंकी जाए।
( मौलिक व अप्रकाशित )
"विरेंदर वीर मेहता"

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Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 5, 2016 at 6:25pm
भाई बैजनाथ शर्मा जी मेरी कथा में आपको अपने पिता के कहे शब्दों की छवि दिखाई दी, इससे बढ़कर मेरे शब्दों की सार्थकता क्या होगी...... सादर आभार भाई जी।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 5, 2016 at 6:22pm
आदरणीया नीता कसार जी रचना पर आपकी प्रोत्साहित टिप्पणी के लिए सादर आभार। (देरी के लिये सादर क्षमा)
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 5, 2016 at 6:21pm
आदरणीया वन्दना जी रचना पर आपके स्नेहिल शब्दों के लिए हार्दिक आभार के साथ देरी के लिये क्षमा। सादर।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 5, 2016 at 6:18pm
आदरणीया राहिला जी रचना पर आपकी प्रोत्साहित टिप्पणी के लिए सादर आभार। (देरी के लिये सादर क्षमा)
Comment by Nita Kasar on June 1, 2016 at 7:37am
पिता को इस उम्र में बदलना ठीक नही होता है,उन पर अपनी इच्छा थोपने का यही परिणाम होता है ।काश उनका मन पढ़ा जाता,बधाई आपको संवेदनशील कथा केलिये आद०सुनील वर्मा जी ।
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 30, 2016 at 10:30pm

आदरणीय .................नमन आपको| .................मुझे मेरे पिताजी द्वारा कही गई कुछ बातें याद आ गई | 

Comment by vandana on May 28, 2016 at 11:16am

वाह मन को छू लेने वाली कथा   बधाई आदरणीय 

Comment by Rahila on May 28, 2016 at 10:57am
बहुत खूब, आजकल तो कपड़ों से ही इज्जत है । सुन्दर कटाक्ष ऊपरी तड़क भड़क पर ।सादर नमन

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