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जो हुआ जैसा हुआ अच्छा हुआ

जो हुआ जैसा हुआ अच्छा हुआ

कब हुआ है पर मेरा सोचा हुआ

ले रहा हूँ साँस तो मैं हर घड़ी

सच तो ये मुझको मरे अरसा हुआ

कौन सुलझाता ये मेरी मुश्किलें

हर कोई अपने में जब उलझा हुआ

मैंने सबको अपना ही माना मग़र

दिल से कोई कब मेरा अपना हुआ

कोशिशें नाकाम ही होंगी सभी

वक़्त कब लौटा भला बीता हुआ

छू रहा है वो शिखर हर रोज ही

दुश्मनों के बीच ये चर्चा हुआ

#दीपक भारतवासी 
मौलिक व् अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2016 at 4:52pm

ले रहा हूँ साँस तो मैं हर घड़ी

सच तो ये मुझको मरे अरसा हुआ----बहुत  मार्मिक शेर दिल छू गया 

कौन सुलझाता ये मेरी मुश्किलें

हर कोई अपने में जब उलझा हुआ----बेहतरीन 

बहुत बहुत बधाई इस शानदार ग़ज़ल के लिए आद० दीपक कुमार जी 

 

Comment by Sushil Sarna on July 1, 2016 at 3:20pm

जो हुआ जैसा हुआ अच्छा हुआ
कब हुआ है पर मेरा सोचा हुआ
ले रहा हूँ साँस तो मैं हर घड़ी
सच तो ये मुझको मरे अरसा हुआ

वाह क्या बात ही अादरणीय ... इस खूबसूरत ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिये हार्दिक बढ़ाई स्वीकार करें।

Comment by deepak kumar shukla on July 1, 2016 at 12:19pm

shukriya sir ise approve karne ke liye 

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