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‘बेच रहा है आज तिरंगा’

 

चौराहे नाके पर बालक

बेच रहा है आज तिरंगा

 

झंडे लेकर उससे इक दो

कुछ पैसे उसको दे डालो

फिर गाडी में उन्हें लगा कर

आज़ादी की रस्म निभा लो

 

खाली हाथों घर जो लौटा

बाप करेगा पी कर पंगा

 

शनि लेकर कल घूम रहा था

सरसों तेल व जलती बाती

भूखे बच्चे चौराहे पर

कब बीतेगी साढ़े साती

 

रोजी उसकी ही खा जाता 

खादी  जाली का हर दंगा

 

बीते न बस रस्मी होकर

आज़ादी का अपना ये दिन

हो पोषित हर दिन हर मन में

हों हिंदी सब भेदभाव बिन

उस जैसे हर बच्चे के घर

पहुँचे खुशहाली की गंगा

 

 मौलिक व् अप्रकाशित  .  

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Comment

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Comment by pratibha pande on August 17, 2016 at 12:23pm

आपको रचना पसंद आई ,मेरा लिखना सार्थक हुआ आपका हार्दिक आभार आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी ..सादर  

Comment by pratibha pande on August 17, 2016 at 12:20pm

 मेरे इस प्रयास पर उपस्थित हो उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ...सादर  

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 16, 2016 at 10:54pm

बीते न बस रस्मी होकर

आज़ादी का अपना ये दिन

हो पोषित हर दिन हर मन में

हों हिंदी सब भेदभाव बिन

उस जैसे हर बच्चे के घर

पहुँचे खुशहाली की गंगा..............वाह ! बहुत सुंदर सन्देश देती उत्तम रचना.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 16, 2016 at 4:53pm

आदरणीया खूबसूरत भावों   से सजी आपकी इस गीत रचना के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

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