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हाथ में हाथ मिला कर देखो (ग़ज़ल)

२१२२ ११२२ २२

खुशनुमा ख्वाब सजा कर देखो,

रात में चाँद बुला कर देखो.

 

नींद आँखों में कहाँ है यारो,

सारे ग़म अपने भुला कर देखो.

 

नफरतें कर रहे हो क्यूँ मुझ से,

हाथ में हाथ मिला कर देखो.

 

तिश्नगी लव पे क्यूँ  तेरे छाई,

जाम हाथों से पिला कर देखो.

 

आज गर्दिश में है तेरी  ‘आभा’,

उस के ग़म दूर भगा कर देखो

 

 

....आभा 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

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Comment by Abha saxena Doonwi on November 10, 2016 at 5:59pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी नमस्कार ,मैं आपकी सलाह पर अवश्य ध्यान दूँगी शुक्रिया आपका ...

Comment by Abha saxena Doonwi on November 10, 2016 at 5:58pm

आदरणीय समर कबीर जी नमस्कार ,मैं आपकी सलाह पर अवश्य ध्यान दूँगी शुक्रिया आपका ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2016 at 10:24am

आदरनीया आभा जी , अच्छी गज़ल हुई है , द्ल से बधाइयाँ स्वीकार करें । आदरनीय समर भाई की बातों पर गौर करियेगा ।

Comment by Samar kabeer on November 9, 2016 at 5:08pm
मोहतरमा आभा सक्सेना जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।
चौथे और पांचवे शैर में शुतरगुरबा का दोष आगया है,देखिएगा ।

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