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माघ शुक्ल की पंचमी, कामदेव के लाल।
दोनों मिलकर आ गए, कण-कण हुआ निहाल ।।

कोयल काली कूकती, खुश हो नाचे मोर ।
माया जिसकी मोहनी,वही मदन चितचोर ।
गेंदा गुलाब ज्यों खिले,खिले गुलाबी गाल।
दोनों मिलकर-------------------।

आई बसंत पंचमी, खुशियों का आगाज ।
वाणी में रस घोलकर, गले मिलें सब आज।
सर्द रैन अब जा चुकी, हटा धुंध का जाल।
दोनों मिलकर --------------------।

ताजा-ताजा लग रहे,गिरा पुराने पात।
डाल डाल को चूमती, भूल अहं औकात ।
देखो सोने सी सजी, नव कोंपल से डाल।
दोनों मिलकर ------------------।

ताल-तलैया प्रेम में,त्याग शर्म औ लाज।
इक दूजे से मिल रहे, ज्यों साजी से साज।
चकधुम-चकधुम चहकते, मिला ताल से ताल।
दोनों मिलकर --------------------।

पवन पुष्प बरसा रहा,कुदरत मेहरबान ।
हरे-भरे इस देश पर, क्यों ना हो अभिमान ।
फूली सरसों पीत ये,करती मालामाल ।
दोनों मिलकर -----------------।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on February 3, 2017 at 9:14pm
श्रद्धेय मिथिलेश वामनकर जी रचना की प्रशंशा के लिए हार्दिक आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2017 at 6:29pm

आदरणीय सुरेश जी, बढ़िया गीत लिखा है आपने. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on February 3, 2017 at 3:03pm
आदरणीय गिरी राज भंडारी जी सादर आभार।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on February 3, 2017 at 3:01pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सादर आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 10:15am

आदरणीय सुरेश भाई , खूबसूरत बासंती गीत रचना के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 12:43pm

आ. भाई सुरेश जी सूंदर रचना हुई है . हार्दिक बधाई .

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