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न्याय या अन्याय (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"इंसान अब तो अपने बनाये लैंसों से लैस है, तमाम तरह के कैमरों ने हमारे काम संभाल कर हमें बड़ी ज़िम्मेदारियों से बचा लिया है!" एक आँख ने दूसरी से कहा।


"हमारा हक़ भी तो छीना गया है न! हमारा अपना दायरा कितना सीमित कर दिया गया है, सोचा कभी?" दूसरी आँख बोली।

"सीसीटीवी कैमरों से अधिक हुआ है यह सब!"

"क्योंकि वे इंसानी स्वभाव से मुक्त हैं, जिस कारण वे भावुक नहीं हो सकते। वे इंसानों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सतर्क रहते हैं, इसलिए पुलिस वालों से भी ज़्यादा भरोसा अब सीसीटीवी कैमरों पर किया जाता है, हम पर नहीं!"

"कोने-कोने पर निगहबान होते हैं ये कैमरे!"

आँखों के बीच की यह बातचीत सुन कान परेशान हो उठे। एक कान बोल ही पड़ा- "कोने-कोने पर कभी हम भी तैनात हुआ करते थे, लोग कहते थे कि दीवारों के भी कान होते हैं!"

"हाँ भाई, अब तो बस यही कहते हैं कि सावधान, आप पर कैमरे की नज़र है!" आँखों ने हँसते हुए कहा।

"लेकिन ये तो दीवार के कानों से भी ख़तरनाक निकले, सब कुछ बेपर्दा फुर्ती से करते हैं वायरल करके! न्याय के पहले अन्याय!" दूसरे कान ने कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 18, 2017 at 8:07pm
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर इतनी हौसला अफ़ज़ाई हेतु बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ साहब। जैसे लेखकों व पाठकों की हौसला अफ़ज़ाई ही हमें बेहतर लिखने को प्रेरित करती है।
Comment by Mohammed Arif on March 18, 2017 at 6:47pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, शरीर के अंगों का मानकीकरण करके बेहतरीन बात कही आपने । वैसे भी आप आपनी लघुकथाओं में नवीन प्रयोग करते रहते हैं । नव-रचनाधर्मिता और नव प्रयोग ही लघुकथाओं को शिखर पर ले जाएगी । ढेरों मुबारक़बाद ।

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