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वर्षा एक --रूप अनेक

जयेष्ट की गर्मी से झुलसी
धरती को
वर्षा की पहली बूंदों से
ख़ुशी मिली
मानो .....
लंका दहन के बाद
हनुमान जी कूदें हो
समुद्र में ॥

सूर्य के अंगारे झेल रही
वर्षा की पहली बूंदों से
किसानों को
ख़ुशी मिली
मानो .....
रावण -वध के बाद
रामचंद्र जानकी सहित
लौटे हो अयोध्या ॥

वर्षा की पहली बूंदें
धरती पर जैसे गिरी
माँ ने .....
गाय के गोबर से बने
सारे उपले
घर के अन्दर कर ली ॥

वर्षा की पहली बूंदें
जैसे गिरी
चीटियों के बिल के मुह पर
उनका कुनवा
निकल पड़ा अन्डो के साथ
सुरक्चित स्थान की और ॥

वर्षा की पहली बूंदों
के साथ
खेतिहर मजदूर
खेतों को वापस आने लगे
मिल -मालिकों के चेहरे बिगड़ने लगे
क्योकि
मजदूरों को ज्यादा पैसे
देने होंगें
उन्हें रोकने के लिए ॥

वर्षा की पहली बूंदों से
इटे बननी बंद हो गयी
इधर मजदूर बेकार हुए
उधर ...
मालिकों ने
ईट के दाम बढ़ा दिए ॥

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 5, 2010 at 5:52pm
Bahut khub Baban bhaiya , pani terey roop anek, aap ney to barish ka ek alag roop hi dekhaa diya hai, bahut hi sunder chitran aur umdda vichar, badhai Baban Bhaiya,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 2, 2010 at 2:47pm
Baban ji bahut vistaar se magar bahut hi saadgi se saath jis tarah pooja manzar apne pesh kiya hai Qabil-e-daad hai. Yeh apki paripakv soch ka hee nateeja hai ki aap Barsaat ke ek anay roop ko bhi bakhoobi chitrit kiya hai. Is sunder kavita ke liye meri dili mubarakbaad qabool keejiye.

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