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गुरु की जीत

आज फिर मोहन सर ने क्लास में अनुराग से प्रश्न पूछा था ,उसके जवाब न देने पर वो उसे डाँटने लगे थे ।अनुराग ने डरते हुए कहा ,"सर अभी ये सवाल आपने करवाया नहीं है । "सर ने कहा "चुप चाप खड़े रहो बहस मत करो ।"अनुराग ने अपनी बड़ी २ आँखो से ऐसे देखा ,जैसे पूछ रहा हो आप हमेशा बिना किसी ग़लती के मुझे क्यों डाँटते रहते है । मोहन सर जब इस स्कूल में नये आए थे तो अनुराग की आँखे उन्हें किसी की याद दिला रही थी । उन्होंने उस से उसके पापा का नाम पूछा था । उनका अंदाज़ा सही था वो उनके कॉलेज के सर का बेटा था , वो नयी उम्र के सर बेवजह उसे परेशान करते थे । पता नहीं क्यों वो भी होशियार अनुराग को जब तब डाँटते रहते थे ।
क्लास ख़त्म होने पर मोहन सर स्टाफ़ रूम में कल लिए टेस्ट की कॉपी चेक करने लगे ।अनुराग ने सारे सवाल सही किए थे , वो उसके नम्बर काटने ही जा रहे थे कि उनके अंदर के गुरु ने उन्हें धिक्कारा ,एक गुरु होकर वो ये क्या करने जा रहा थे ,ऐसा करके वो अनुराग की आँखो में उठे सवालों क्या जवाब देंगे ।उन्होंने उसे पूरे नम्बर देकर वेरी गुड लिखा । उनके मन का मैल धूल गया था ।आज एक गुरु जीत गए थे ,और कलेंडर में गुरु पूर्णिमा मुस्कुरा दी थी ।
बरखा शुक्ला
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Barkha Shukla on July 9, 2017 at 2:35pm
बहुत २ धन्यवाद आदरणीय उस्मानी सर , मैं आपके सुझाव पर ध्यान देकर शीर्षक देने की कोशिश करती हूँ । आप भी कोई अच्छा शीर्षक बताए ।सादर
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 9, 2017 at 12:04pm
गुरू पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर बेहतरीन भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए सादर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ आदरणीय बरखा शुक्ल जी। समय देकर रचना को एडिट कर बढ़िया सा शीर्षक भी प्रदान कीजिएगा।

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