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कविता- जी एस टी
 
मैं सो रही थी मुझे उठाया गया,
नींद में ही गाडी में बैठाया गया !
होश में आती उससे पहले ही बताया गया, 
व्यापारियों का खून चूसने जीएसटी लगाया गया !
 
अधिकारी के दफ़्तर संग लाया गया,
टेक्स का सारा दुख जताया गया !
टेक्स का सारा दुख जताया गया,
मुझे अधिकारी के दफ़्तर लाया गया !
 
बोले पहल तुम करोगी हमारी,
दलदल में मुझ बेचारी को फसाया गया !
मुझ बेचारी को दलदल में फसाया गया,
व्यापारियों का एक एक दुख सुनाया गया !
 
कौन हो तुम, आयी हो कहां से ?
आंखें दिखाकर मुझपर चिल्लाया गया !
आंखें दिखाकर मुझपर चिल्लाया गया ,
फ़िर भीड़ से मेरे बारे में पुछ्वाया गया !
 
समाज सेविका जान दफ़्तर में बुलाया गया,
फ़िर जीएसटी का मतलब समझाया गया !
जीएसटी का मतलब समझाया गया,
जनता को समझाने का काम दिलाया गया !
 
नींद - नींद में सफल लीडर बनाया गया ,
लीडर बन मंच पर भाषण सुनाया गया !
लीडर बन मंच पर भाषण सुनाया गया ,
नींद खुली तो खुद को बिस्तर पर पाया गया !
--------------------
= जयति जैन "नूतन"
युवा लेखिका , रानीपुर झांसी उ.प्र.

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Comment by Mohit mishra (mukt) on October 31, 2017 at 1:47pm

उत्तम रचना बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाई आदरणीया 

Comment by Mohammed Arif on October 29, 2017 at 5:46pm
आदरणीया जयति जैन जी आदाब, जीएसटी के दंश को पूरा देश झेल रहा है । जीएसटी ने पूरे देश के उद्योग जगत् को तहस-नहस करके रख दिया है । छोटे कारोबारी सब मारे गए हैं । सरकार का विकास का झूठा झुनझुना बिका हुआ मीडिया रात-दिन बजा रहा है । यह केवल आपकी या मेरी पीड़ा नहीं है हर भारतीय की पीड़ा है । बहुत अच्छी पीड़ा बयाँ की आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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