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गज़ल -अक्सीर दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है

काफिया आम, रदीफ़ : बहुत है

बह्र : २२१  १२२१  १२२१  १२२ (१)

अकसीर  दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है

बेहोश मुझे करने’ मय-ए-जाम बहुत है |

वादा किया’ देंगे सभी’ को घर, नहीं’ आशा

टूटी है’ कुटी पर मुझे’ आराम बहुत है |

प्रासाद विशाल और सुभीता सभी’ भरपूर   

इंसान हैं’ दागी सभी’, बदनाम बहुत हैं |

है राजनयिक दंड से’ ऊपर, यही’ अभिमान

शासन करे स्वीकार, कि इलज़ाम बहुत है |

साकी की’ इनायत क्या’ कहे,दिल का फ़साना

आगोश में’ थी मेरे’ ये ईनाम बहुत है |

अकसीर=बहु गुणकारी

मौलिक /अप्रकाशित 

Views: 429

Comment

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Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 3, 2017 at 11:33am

सादर आभार आ नरेन्द्र सिंह चौहान जी |

Comment by narendrasinh chauhan on November 2, 2017 at 5:47pm

 सुंदर रचना

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