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ग़ज़ल-कभी दुख कभी सुख, दुआ चाहता हूँ (संशोधित )

तरही ग़ज़ल  अल्लामा इकबाल जी का  मिसरा 

“ तेरे इश्क की इम्तिहाँ चाहता हूँ “

काफिया : आ ; रदीफ़ :चाहता हूँ

बहर : १२२  १२२  १२२  १२२

*****************************

कभी दुख कभी सुख, दुआ चाहता हूँ

इनायत तेरी आजमा चाहता हूँ |

'वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ
तेरे इश्क की इम्तिहा चाहता हूँ |

जो’ भी कोशिशे की हुई सब विफल अब

हूँ’ बेघर मैं’ अब आसरा चाहता हूँ |

ज़माना हमेशा छकाया मुझे है

अभी मैं उसे जीतना चाहता हूँ |

'दिये हैं बहुत दुख ज़माने ने मुझको'

मैं’ तेरी कृपा की दवा चाहता हूँ |

तू’ ने क्यों बनाया यही विश्व ब्रह्माण्ड

छुपे राज़ को जानना चाहता हूँ |

निरपराध जो है, उसे क्यों सज़ा हो

बता अब तेरा फैसला चाहता हूँ |

'रिवाज आदमी ने सभी हैं बनाए'

अहितकर सभी तोड़ना चाहता हूँ |

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 1, 2017 at 9:08pm

आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब, "बेवफाई " शब्द है ,तो मुझे लगा वफाई भी होगी " शब्दकोष देखा उसमे नहीं था | आपसे सुनिश्चित करने के लिए ही मैंने इसको लिखा | अब मालुम हो गया | विस्तृत विश्लेषण के लिए हार्दिक आभार आपका | संशोधन कर फिर प्रस्तुत करता हूँ | सदर आदाब 

Comment by Samar kabeer on November 1, 2017 at 5:53pm
जनाब कालीपद प्रसाद मण्डल जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
ग़ज़ल अभी और समय चाहती है :-
'वफ़ाई के,बदले वफ़ा मांगता हूँ'
'वफ़ाई'क्या शब्द है भाई?और 'मांगता हूं'यहाँ रदीफ़ बदल गई, और क़ाफ़िया नदारद ?और सानी मिसरे में 'इन्तिहाँ'नहीं "इन्तिहा"इस मतले को यूँ कर सकते हैं :-
'वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ
"तेरे इश्क़ की इन्तिहा चाहता हूँ"'
'किया यत्न हमने सकल वियर्थ है अब'
ये मिसरा लय में नहीं है, और शुतरगुर्बा का दोष भी है,
किया यत्न/122मात्रा पतन
हमने स/221
कल व्यर्थ/212
है अब/22
"अभी मैं छकाना उसे चाहता हूँ'
इस मिसरे में क़ाफ़िया नदारद है ।
'दिया ज़ख़्म मुझको ज़माना बहुत है'
इस मिसरे में व्याकरण दोष,और ऐब-ए-तनाफ़ुर भी है, इसे यूँ कर सकते हैं:-
'दिये हैं बहुत दुख ज़माने ने मुझको'
"छुपा राज़ को जानना चाहता हूँ'
"छुपे राज़ को जानना चाहता हूँ"
'निरपराध जी हैं उसे क्यों सज़ा हो'
इस मिसरे में 'हैं' को "है" कर लें ।
'रिवाजें बनाये सभी आदमी ने'
इस मिसरे में 'रिवाजें'शब्द ग़लत है,इसे यूँ कीजिये:-
'रिवाज आदमी ने सभी हैं बनाए'
बाक़ी शुभ शुभ
Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 1, 2017 at 7:19am

आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी  कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद | अभी बह्र में है | सादर नमन 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2017 at 7:17pm
अभी मैं उसीको छकाना चाहता हूँ ये बह्र में नहीं लगा।।देखिएगा
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2017 at 7:12pm
आदरणीय काली प्रसाद जी ग़ज़ल अच्छी लगी इम्तिहाँ के साथ बाकी काफिये में आ थोडा दुबिधा नें हूँ गुनी जनों की राय से स्पष्ट हो सकेगा रचना पर हार्दिक बधाई सादर

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