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ग़ज़ल-रहनुमा का’ मन काला, शक्ल पर उजाला है |

काफिया : आला . रदीफ़ : है

बह्र : २१२  १२२२  २१२  १२२२

हाथ में वही अंगूरी सुरा,पियाला है

रहनुमा का’ मन काला, शक्ल पर उजाला है |

छीन ली गई है आजीविका, दिवाला है

ढूंढ़ते रहे हैं सब, स्रोत को खँगाला है ||

आसमान पर जुगनू, चाँद सूर्य धरती पर

धर्म कर्म सब कुछ, भगवान का निराला है |

सब गड़े हुए मुर्दों को, उखाड़ते नेता

अब चुनाव क्या आया, भूत को उछाला है |

राज नीति में रिश्तेदार ही, अहम है सब

वो कहीं बहन भाई, या हबीब साला है |

समतलों में सब मस्जिद चर्च, बात है अद्भूत

उस पहाड़ पर जो कोठी, वही शिवाला है |

वो बड़ी बड़ी आँखें, प्रेयसी की हैं कातिल

शोख वो नयन लगते, चश्म- ए- गज़ाला है |

है समानता मन्दिर और, मद्य खाने में

बारहा चढ़े जो ‘काली’ के’ सिर, वो’ हाला है |

मौलिक/ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 6, 2017 at 8:17pm

आदरणीय समीर कबीर साहिब आदाब , सही कहा आपने  , तकतीअ के समय उधर ध्यान नहीं गया | उसको ठीक करके दुबारा पेश करता हूँ | आदाब 

Comment by Samar kabeer on November 6, 2017 at 5:39pm
जनाब कालीपद प्रसाद मण्डल जी आदाब,ग़ज़ल बहुत समय चाहती है,इसे फिर से कहने की कोशिश करें,हुस्न-ए-मतला में ईता दोष है ।

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