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ग़ज़ल -ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बगैर-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया :अर ; रदीफ़ : कहे बगैर 

बह्र :२२१  २१२१  १२२१  २१२ (१)

ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बग़ैर 

आता सदा वही बुरा’ अवसर कहे बग़ैर |

बलमा नहीं गया कभी’ बाहर कहे बग़ैर

आता कभी नहीं यहाँ’, जाकर कहे बग़ैर |

है धर्म कर्म शील सभी व्यक्ति जागरूक

दिन रात परिक्रमा करे’ दिनकर कहे बग़ैर | 

दुर्बल के  क़र्ज़  मुक्ति  सभी होनी  चाहिए

क्यों ले ज़मीनदार सभी कर कहे बग़ैर |

सब धर्म पालते मे’रे’ साजन, मगर है’ दूर

आकर गए तमाम निभाकर, कहे बग़ैर |

मिलने में’ थी हँसी ख़ुशी’ अब चैन भी नहीं  

सुख चैन ले गए वो’ चुराकर कहे बग़ैर |

चौकस रहो सदा सभी’, गलती न कर कभी

बैरी चलाते’ विष बुझी’ नस्तर कहे बग़ैर |

जीवन सदैव धन्य हो’ चौकस विवेक हो

आती विपत्तियाँ सभी’ ‘अक्सर  कहे बग़ैर |  

मौलिक /अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 13, 2017 at 9:35am
सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 13, 2017 at 9:04am
हार्दिक बधाई ।
Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 12, 2017 at 3:25pm

आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्र जी सराहना के लिए सादर आभार आपका 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 12, 2017 at 3:24pm

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी सराहना के लिए सादर आभार आपका 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 12, 2017 at 3:20pm

आदरणीय समर कबीर साहिब ,सादर आदाब , बारीकी से ग़ज़ल की तकती करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा  करता हूँ \ आगे भी कृपा बनाये रखें | सुधार कर  दुबारा पेश करता हूँ|
 सादर  

Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 12, 2017 at 3:13pm

आदरणीय मुहम्मद आरिफ साहिब आदाब , आपने बजा फरमाया |उनको सुधारकर फिर पेश करता हूँ  |बहुत बहुत शुक्रिया आपका |

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 11, 2017 at 11:43am

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने इस रचनापर हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Gurpreet Singh jammu on November 10, 2017 at 3:15pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय कालीपद जी ,, बधाई स्वीकार करें 

Comment by Samar kabeer on November 10, 2017 at 2:09pm
जनाब कालीपद प्रसाद मण्डल जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
चौथे शैर में 'माफ़'ग़लत है,सही शब्द है "मुआफ़" ।
मक़्ते में क़ाफ़िया ही नहीं है ।
Comment by Mohammed Arif on November 10, 2017 at 2:08pm
आदरणीय कालीपद प्रसाद जी आदाब, बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल । हर शे'र माक़ूल है ।शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं जैसे-बगैर/बग़ैर, कर्ज/क़र्ज़,जमीनदार/ज़मींदार आदि ।

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