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ग़ज़ल- एक नेता हर गली कूचे में है।

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

2122 2122 212
वो कबूतर बाज के पंजे में है।
फिर भी कहता है भले चंगे में है।

हम उसे बूढ़ा समझते हैं मगर,
एक चिन्गारी उसी बूढ़े में है।

ये सियासत आज पहुँची है कहाँ,
एक नेता हर गली कूचे में है।

वो मज़ा शायद ही जन्नत में मिले,
जो मज़ा छुट्टी के दिन सोने में है।

इस सियासत में फले फूले बहुत,
कितनी बरकत आपके धंधे में है।

नींद जो आती है खाली खाट पर,
वो कहाँ पर फोम के गद्दे में है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Shyam Narain Verma on December 8, 2017 at 7:10am
बहूत उम्दा हार्दिक बधाई l सादर
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 7, 2017 at 10:45pm

आदरणीय समर कबीर साहब जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया सचमुच ये मिसरा बह्र में नहीं है। नेतागीरी में ता का वज्न गिराना पड़ रहा है। मैं इसे ठीक करता हूँ। पुन: आपका शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on December 7, 2017 at 10:24pm

जनाब राम अवध जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के सानी मिसरे में व्याकरण दोष है ।

"नेतागीरी में फले फूले बहुत'

ये मिसरा लय में नहीं है ।

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