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महानगर में
सड़क के किनारे खड़ा था
१२ रूपये प्रति दर्जन की दर से
केले लेने पर अड़ा था ॥

कार से एक सज्जन आये
दुकानदार ने
२५ रूपये प्रति दर्जन की दर से
सब केले बेच दिए .... ॥

मैं बेवश था
सोच रहा था ....
कहां है महँगाई
खोज ही लिया मैं
महँगाई मेरे पर्स में रहती है
और जब
पर्स नोटों से भरी हो
मंहगाई पास भी नहीं फटकती

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 10, 2010 at 9:18am
बब्बन भैया ,आपकी कविता बिलकुल यथार्थ को संबोधित कर रही है, अमीरों के कुत्तो पर जितना खर्च होता है उतने खर्च मे एक गरीब का परिवार अपनी जरूरतों को पूरा कर सकता है, अमीरों के एक दिन के शराब के खर्च पर आम आदमी के बच्चे का एक महीने का स्कूल फ़ीस दिया जा सकता है, अंत मे गुड्डो दादी ने बहुत ही सधे शब्दों मे बड़ी बात कह गई है, बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता पर,
Comment by guddo dadi on July 10, 2010 at 2:08am
कहाँ मिलती है धनी वर्ग और नेताओं के घर तो नहीं
जब भी मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री विदेशी दौरा पर जाते है पीछे से महंगाई पत्र छोड़ जाते हैं
नेताओं निर्धन को भी दो टूक खाने दो
Comment by Neelam Upadhyaya on July 8, 2010 at 2:24pm
बहुत ही सटीक कथन है - " महंगाई तो पर्स में ही रहती है ।"
Comment by baban pandey on July 8, 2010 at 1:19pm
thanks ...kanchan pandey ji ....your comment energises me .
Comment by Kanchan Pandey on July 8, 2010 at 11:48am
Sahi kah rahey hai Babban jee, mahangaai to Batuwaa mey hi hoti hai yadi aap ka batuwa noto sey bhara hai to kaisi mahangaai, kuchh log 99 rupayey ka bargar khaa kar kahtey hai ki bargar sasta ho gaya hai, aur kuch log 99 rupayey key majdoori par din bhar khun pasina bahaatey hai, badhiya likhey hai , thanks,

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