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द्वंद्व के ख़तरे (लघुकथा)

"लोकतंत्र ख़तरे में है!"
"कहां?"
"इस राष्ट्र में या उस मुल्क में या उन सभी देशों में जहां वह किसी तरह है!"
"अरे, यह कहो कि वही 'लोकतंत्र' जो कि कठपुतली बन गया है तथाकथित विकसितों के मायाजाल में!"
"हां, तकनीकी, वैज्ञानिकी विकास में या ब्लैकमेलिंग- व्यवसाय में!"
"सच तो यह है कि जो धरातल, स्तंभों से दूर हो कर‌ खो सा गया है कहीं आसमान में!"
"हां, दिवास्वप्नों की आंधियों में!"
"... और अजीबोग़रीब अनुसंधानों में!"
"भाई, इसी तरह यह क्यों नहीं कहते कि इंसानियत ही ख़तरे में है!"
"कहां? इस मुल्क में या उस राष्ट्र में! या उन सभी देशों में, जहां वह किसी तरह है!"
"अरे, यह कहो न‌ कि वही 'ईमानदारी' जो कि कठपुतली बन गयी है शैतानों के मायाजाल में! कुसंस्कारों, भ्रष्टाचरणों के विकास में!"
"हां, वही जो कि धार्मिक-स्तंभों और तहज़ीब से दूर हो कर बस रो रही है निरंतर आत्मा संग कहीं निर्जीव से मानव-शरीर में!"
"जी बिल्कुल! धार्मिक-साहित्यिक किताबों में, विभिन्न विधाओं में!"
"लेकिन तअ़ल्लुक है न दोनों का ज़मीनी हक़ीक़तों में! दुनियावी हालात में!"
"हां, है! लेकिन इंसानियत और लोकतंत्र के बीच द्वंद्व के रूप में! इस नई सदी के विचार-मंथन के सागर में!"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 30, 2018 at 11:09pm

मेरी इस ब्लॉग पोस्ट पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब।

Comment by Samar kabeer on April 28, 2018 at 10:26pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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