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नियति का नीयत नियत होता, यह है कायर का कहना.

नियति भरोसे जीवन -यापन, जीवन से है छल करना.

यदि मनुज चाहे तो उसका, भाग्य बदल सकता है.

पत्थर के सीने से भी, निर्मल जल बह सकता है.

महाशक्ति है पौरुषबल, जो बदल डालता ब्रम्ह्लेख.

अमित बार सुर काँप उठे, मानव का अनुपम तेज देख.

सर्व शक्तिमान है मानव, है उचित पराश्रित रहना ?

नियति भरोसे जीवन -यापन, जीवन से है छल करना.

नियति गौण मानव -जीवन में, कर्म पक्ष की महता है.

जन्मजात गुण पुरुषोत्तम का, सत्य और कर्मठता है.

क्या लिखा भाग्य में मानव के,ब्रम्हा को भी यह ज्ञान नहीं.

मानव के भावी जीवन का, किस्मत को भी पहचान नहीं.

विश्वास स्वयं पर नहीं जिसे, उसको ही पड़ता दुःख सहना.

नियति भरोसे जीवन -यापन, जीवन से है छल करना.

सूत-पुत्र था कर्ण किन्तु,शासक बन बैठा निज कर्मों से.

था अंत्यज रैदास किन्तु , विख्यात हुआ था निज धर्मों से.

खोई मर्यादा अर्जित की, वीर हुमायूं बाहुबल से.

शेरखान शाह बन बैठा, निज कर्मों से -निज कौशल से.

कर्म -दीप हो जिसके कर में, उसको तम से क्या डरना ?

नियति भरोसे जीवन -यापन, जीवन से है छल करना.

कर्म -दीप उस कर की शोभा, नैतिकता जिसका आभूषण.

शिखा ईमान - तेल सच्चाई, जीवन -पथ हो रहित प्रदुषण.

जीवन को आराम समझना, मात्र भ्रम यह तेरा है.

प्रिय! तुम्हारे कर कमलों में मानसरोवर मेरा है.

गीतकार -सतीश मापतपुरी

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 24, 2011 at 10:21am

यदि मनुज चाहे तो उसका, भाग्य बदल सकता है.

नियति भरोसे जीवन -यापन, जीवन से है छल करना.

 

वाह वाह सतीश भईया , बहुत ही सार्थक और ज्ञान से परिपूर्ण रचना दिया है आपने , बहुत बहुत बधाई स्वीकार करे |

कृपया ध्यान दे...

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