For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Satish mapatpuri's Blog (95)

अगर पूर्वजों के सहारे न होते .

अगर रंग - बिरंगे ये नारे न होते.
तो फिर हम भी इतने बेचारे न होते .
बस बातों के मरहम से भर जाते शायद .
अगर ज़ख्म दिल के करारे न होते .
भला किसकी हिम्मत सितम ढा सके यूँ .
अगर हम जो आदत बिगाड़े न होते .
कहीं ना कहीं से तो शह मिल रहा है .
निर्भया के बसन यूँ उतारे न होते .
मिट जाती  कब की  ये रस्मोरिवाज़ें .
अगर पूर्वजों के सहारे  न होते .
  
मौलिक और अप्रकाशित
सतीश मापतपुरी

Added by satish mapatpuri on September 20, 2015 at 10:00pm — 3 Comments

गुरुवर तुम्हें नमन है ( शिक्षक दिवस पर विशेष )

 

जिसने बताया हमको , लिखना हमारा नाम .

जिसने सिखाया हमको , कविता ,ग़ज़ल -कलाम .

समझाया जिसने हमको , दीने -धरम ,ईमान .

जिसने कहा कि एक है ,कह लो रहीम - राम .

भगवान से भी पहले ,करता नमन उन्हीं को .

मानों तो हैं  खुदा वो , ना मानों तो हैं आम .…

Continue

Added by satish mapatpuri on September 5, 2012 at 3:46am — 18 Comments

गुनाहगार बनाया क्यों ?

 

ऐ मालिक ! बता दे तू , कि बहार बनाया क्यों ?

गर बहार बना था , तो उजाड़ बनाया क्यों ?

चमन में खिलती हैं कलियाँ , कली से नेह भौरों को .

पर भंवरे काँप उठे उस वक़्त , आखिर खार बनाया क्यों ?

जुदाई प्यार की मंजिल , तड़पना दिल को पड़ता है .

दिवाना कहती है दुनिया , तो फिर यह  प्यार बनाया क्यों ?

मिलन की चाह होती है , मिलन होता मुकद्दर से .

तो मिलकर क्यों बिछड़ते हैं , आखिर दीदार बनाया क्यों ?

अगर मापतपुरी जालिम  , तो उस पे कर करम मौला .

ख़ता…

Continue

Added by satish mapatpuri on August 31, 2012 at 2:15am — 4 Comments

कबीरा खड़ा बाजार में

 [ एक ]

कठपुतली भी हँस रही, देख मनुज का हाल.

सबसे बड़ा मदारी वो , लिखे जो सबका भाल.

कौन नचाता है किसे, क्या इसका परमान.

सबकी डोर पे पकड़ जिसे, कहते कृपानिधान.

 जिस उर में लालच बसे ,वहाँ कहाँ ईमान .

देय वस्तु पर नेह जिसे , सबसे बड़ा नादान.

जीवन गगरी माटी की , जिसका करम कोंहार .

सरग - नरक येही ठौर है , जिसका जस व्यवहार .

देने वाले ने दिया , एक सूर्य और सोम .

किन्तु मनुज ने बाँट ली , धरती नदियाँ व्योम .

कहत अभागा नियति का , नीयत नियत…

Continue

Added by satish mapatpuri on August 3, 2012 at 1:27am — 6 Comments

ज़िन्दगी खुद में ही तो एक जंग का एलान है.

ज़िन्दों और परिंदों का बस एक ही पहचान है.
ना ही थकना, ना ही रुकना बस और बस उड़ान है.
एक जगह जो रुक गया तो रुक गया उसका सफ़र.
इसलिए ही अब तो मंजिल रोज़ एक मुकाम है.
कौन कहता है जहां में ज़िंदा रहना है कठिन.
आदमी में है ही क्या एक जिस्म और एक जान है.
मौसमे बारिश गिरा देता है कितने आशियाँ .
हिम्मते मरदा है जो कि हर तरफ मकान है.
ज़िन्दगी में जंग ना तो क्या मज़ा मापतपुरी.
ज़िन्दगी खुद में ही तो एक जंग का एलान है.
          ----- सतीश मापतपुरी

Added by satish mapatpuri on April 23, 2012 at 3:58am — 10 Comments

बच्चों की फरियाद



बंजर धरती दूषित हवा - जल, जंगल कटते जायेंगे.

 ज़ख़्मी पर्यावरण आपसे , क्या हम बच्चे पायेंगे.

हरी - भरी धरती को आपने, बिन सोचे वीरान किया.

मतलब की खातिर ही आपने, वन - जंगल सुनसान किया.

नहीं बचेगा इन्सां भी, गर जीव - जंतु मिट जायेंगे.

ज़ख़्मी पर्यावरण आपसे , क्या हम बच्चे पायेंगे.

ऐसे पर्यावरण में कैसे, कोई राष्ट्र विकास करेगा.

अब भी गर बेखबर रहे तो, माफ नहीं इतिहास करेगा.

रहते समय नहीं चेते तो, कर मलते रह जायेंगे.

ज़ख़्मी पर्यावरण आपसे , क्या हम…

Continue

Added by satish mapatpuri on April 22, 2012 at 2:45am — 7 Comments

जहाँ गंगा जैसी सरिता है

 असंख्य घड़े को जल देकर भी, तेरा कोष न रीता  है.
धन्य - धन्य वह भारत है , जहाँ गंगा जैसी सरिता है.
तू सदैव निःस्वार्थ भाव से, हिंद - भूमि को सींचा है.
श्यामा के अभिराम वक्ष पर, लक्ष्मण - रेखा खींचा है.
भारत की मर्यादा की, यह रेखा एक निशानी है.
शहीदों की कुर्बानी की, यह रेखा एक कहानी है.
तेरी लहरों में…
Continue

Added by satish mapatpuri on April 14, 2012 at 7:30pm — 9 Comments

मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .

 

जान ले लेगा वो तिल, लब पे जो बनाया है .

मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .

मुस्कुराती हो जब तो गालों पे, जानलेवा भंवर सा बनता है.

खोलती हो अदा से जब पलकें , झील में दो कँवल सा खिलता है.

साथ जिसको नहीं मिला तेरा, क्यों यहाँ ज़िन्दगी गंवाया है.

मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .

हुस्न की देवी तेरे ही दम से, खिलते हैं फूल दिल के गुलशन में.

देखकर तुमको ही ये हुरे ज़मीं , पलते हैं इश्क दिल की धड़कन में.

हर कोई देखता है तुमको ही, रब…

Continue

Added by satish mapatpuri on April 11, 2012 at 12:42am — 11 Comments

मेरे गीतों को होठों से छू लो जरा

 

ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.

वक़्त बे वक़्त यूँ ना लो अंगड़ाइयां, देखने वाला बेमौत मर जायेगा.

                     होंठ तेरे गुलाबी ,शराबी नयन.

                    संगमरमर सा उजला है , तेरा बदन.

रूप यूँ ना सजाया - संवारा करो, टूट कर आईना भी बिखर जायेगा.

ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.

                     सारी दुनिया ही तुम पर, मेहरबान है.

                      देख तुमको…

Continue

Added by satish mapatpuri on April 5, 2012 at 6:58pm — 13 Comments

होली मुबारक

बरसा है रंगों का सावन , धरती के आँगन में.
अब ना होगा काँटा , होगा गुल ही गुल गुलशन में.
मैल दिलों का धुल जाते हैं , होते सब खुशहाल.
ये है होली का मस्त धमाल .
OBO परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभ कामनाएं
                                      -------- सतीश मापतपुरी…
Continue

Added by satish mapatpuri on March 9, 2012 at 12:40pm — 2 Comments

कटी पतंग (एक बलात्कार -पीड़िता का ग़म)

 
ना मैं हंसी हूँ - ना मैं ख़ुशी हूँ, ना मैं रंग -उमंग हूँ.
मेरा जीवन एक अफसाना , मैं एक कटी पतंग हूँ.
डोर से कटकर लटक गयी हूँ, मंजिल -पथ से भटक गयी हूँ.
कोई रंग चढ़े भी कैसे , मैं ऐसा बदरंग हूँ.
मेरा जीवन एक अफसाना , मैं एक कटी पतंग हूँ.
तूफानों में जकड़ गयी हूँ, साहिल से मैं बिछड़ गयी हूँ.
किस मुँह से बाबुल से कहूँ मैं, रंज़ोग़म के संग हूँ.
मेरा जीवन एक अफसाना , मैं एक कटी पतंग हूँ.
किस -किस…
Continue

Added by satish mapatpuri on March 4, 2012 at 5:20pm — 7 Comments

मानसरोवर - 8

         

रे मानव क्या सोच रहा, इस मरघट में क्या खोज रहा ?
यथार्थ नहीं - यह धोखा है, सार नहीं यह थोथा है.
               यह जग माया का है बाज़ार.
               जहाँ रिश्ता का होता व्यापार.
कोई मातु - पिता, कोई भाई है, कोई बेटी और जमाई है.
कोई प्यारा सुत बन आया है, कोई बहन और कोई जाया है.
                    ये रिश्ते हैं छल के प्राकार.
                    ये हैं माया के ही प्रकार.
इस माया को ही…
Continue

Added by satish mapatpuri on February 24, 2012 at 2:05am — 7 Comments

एक लड़की ( हास्य)

 
मुझे देख के एक लड़की, बस हौले -हौले हंसती है.
प्रेम - जाल मैं डाल के थक गया, पर कुड़ी नहीं फंसती है .
मुझे देख के एक लड़की, बस हौले -हौले हंसती है.
रहती है मेरे पड़ोस में वो, कुछ चंचल - कुछ शोख है वो.
ना गोरी - ना काली है,…
Continue

Added by satish mapatpuri on February 15, 2012 at 1:08am — 5 Comments

सबको मुबारक हो, आना नये साल का.

दिल खोल गायें, तराना नये साल का.

सबको मुबारक हो, आना नये साल का.

खुशियाँ ही खुशियाँ, दिवाली ही दिवाली हो.

हर दिन सुहाना हो, रात मतवाली हो.

शांति- सुकून हो, नज़राना नये साल का.

सबको मुबारक हो, आना नये साल का.

प्यार बिना यारों, ये ज़िन्दगी बेकार है.

मिल्लत औ चाहत, अमन का आधार है.

सुख - समृद्धि हो, खज़ाना नये साल का.

सबको मुबारक हो, आना नये साल का.

मापतपुरी सबको हो,जलवा सिंगार का.

सबको सौगात मिले, उसके सच्चे प्यार का.

ऐसा हसीन हो,…

Continue

Added by satish mapatpuri on January 1, 2012 at 3:30am — 8 Comments

बिहार (यश - गान )

 
जय - जय बिहार की भूमि, तुम्हें शत नमन हमारा.
तेरी महिमा अतुलनीय , यश तेरा निर्मल - न्यारा.
तुम्हें शत नमन हमारा - तुम्हें शत नमन हमारा.
फली - फुली सभ्यता - मानवता , तेरी ही गोदी में.
बिखरी है चहुँओर सम्पदा , इस पावन माटी में.
जली यहीं से ज्योति ज्ञान की, चमका विश्व ये सारा.
तुम्हें शत नमन हमारा - तुम्हें शत नमन हमारा.
राजनीति या धर्मनीति हो, शास्त्रनीति या शस्त्रनीति हो.
उद्गम - स्थल यहीं…
Continue

Added by satish mapatpuri on December 11, 2011 at 11:05pm — 1 Comment

त्यागपत्र (कहानी)

त्यागपत्र (कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

अंक ९ पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करे

------------- अंक - 10 (अंतिम अंक) --------------

सुबह के तीन बजे रंजन की स्थिति में कुछ -कुछ सुधार होने लगा. ईलाज में लगे डॉक्टरों को थोड़ी सी राहत मिली. बेटे की हालत में सुधार देखकर प्रबल बाबू ने आँखें बंद कर उस ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया,…

Continue

Added by satish mapatpuri on December 6, 2011 at 8:30pm — 2 Comments

ये बिहार है (गौरव गीत )

सब धर्मों का एक सा आदर , ऐसा यहाँ आचार है.
होते हैं भगवान अतिथि , ऐसा यहाँ विचार है.
ये बिहार है ................ ये बिहार है.
महावीर का सन्देश है - यहाँ बुद्ध का उपदेश है.
यहाँ आर्य भट्ट का खगोल  है - यहाँ माटी भी  अनमोल है.
नालंदा का यहाँ ज्ञान  है - यहाँ सीता का सम्मान है.
अशोक का है शौर्य यहाँ - आम्रपाली  का सौन्दर्य यहाँ.
यहाँ बाल्मीकि का सृजन है - यहाँ गुरु गोविन्द का जन्म है.
शेरशाह का जोश है -…
Continue

Added by satish mapatpuri on December 5, 2011 at 5:00pm — 4 Comments

त्यागपत्र (कहानी)

त्यागपत्र (कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

अंक 8 पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करे

------------- अंक - 9  --------------

रात्रि के 12 बज रहे थे. सिंह साहेब के सम्मान में एक बड़ी दवा कम्पनी ने राजधानी के एक शानदार होटल में भोज का आयोजन किया था.  प्रबल बाबू उस दुनिया से बेखबर हो चुके थे, जहाँ गरीबी रेखा से भी नीचे लोग अपना जीवन बसर करते…

Continue

Added by satish mapatpuri on November 7, 2011 at 8:00pm — 1 Comment

त्यागपत्र (कहानी)

त्यागपत्र (कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

अंक 7 पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करे

-------------- अंक - 8 --------------

प्रबल प्रताप सिंह अब पूरी तरह बदल चुके थे. उनकी ममता को नैतिकता की वेदी पर अपने बच्चों का भविष्य कुर्बान करना गंवारा नहीं था. जीवन एक चढ़ान का नाम है, जहाँ से इंसान एक बार फिसलता है तो गिरता ही चला जाता है. उत्थान से…

Continue

Added by satish mapatpuri on November 6, 2011 at 2:30pm — 1 Comment

त्यागपत्र (कहानी)

त्यागपत्र (कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

अंक 6 पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करे

-------------- अंक - 7 --------------

  प्रबल बाबू की खामोशी यह बता रही थी कि उनके भीतर विचारों का सैलाब उमड़ रहा है. कहीं नेक विचार उनके भीतर के जग रहे शैतान को पराजित न कर दे, यह सोचकर अध्यक्ष ने उनकी स्वार्थपरता को हवा देना जारी रखा. ........ 'आज समाज…

Continue

Added by satish mapatpuri on November 5, 2011 at 11:30am — 2 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

PHOOL SINGH posted a blog post

वृक्ष की पुकार

नहीं माँगता जीवन अपना, पर बेवजह मुझको काटो नाजो ना आये जहां में अब तक, उनके लिए भी वृक्ष छोड़ो ना…See More
2 hours ago
Usha Awasthi posted a blog post

केवल ऐसी चाह

द्वापर युग में कृष्ण नेपान्डव का दे साथहो विरुद्ध कुरुवंश केरचा एक इतिहासकलियुग की अब क्या…See More
3 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post मुझे भी पढ़ना है - लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।"
3 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post कब तक  - लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी।आदाब।"
3 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post कब तक  - लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी जी।"
3 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"आज की गोष्ठी में.विषयांतर्गत सहभागिता बढ़िया रही। यदि सहभागिता कम हो पा.रही है, तो.इस गोष्ठी को…"
12 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"आपने रचना के मूल भाव को यानी संकटकाल को सही तरह से पकड़ा है। स्पष्टता कहाँ कम है, यह भी बताइएगा।"
12 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"आदाब। रचना पर टिप्पणी और मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी।"
12 hours ago
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रखिहै सबका तुष्ट
"आ0 समर कबीर  साहेब, आदाब रचना अच्छी लगी, जान कर खुशी हुई। हार्दिक आभार आपका"
14 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"आदरणीया प्रतिभा जी,आपका दिली आभार।मेरी लघुकथाएं आपका ध्यान आकृष्ट करती हैं,यह मेरा सौभाग्य है।"
16 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"ठसाठस भरी बस में माँ और शिशु की समस्या। अगर मैं सही समझी हूँ तो आपने इशारों में आज के संकटकाल की…"
18 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी।"
19 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service