For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ऊपर है नीला आसमान, नीचे विशाल वसुधा ललाम.
सर -सरिता और उत्स भूधर, फैले अरण्य अनुपम सुन्दर.

राकेश -रवि को जेल यहाँ.
है दिवा -रात्रि का खेल यहाँ.

ब्योम  -बाग़ में  पुष्प सितारे, अचल अपलक जिसे निहारे.
श्यामा की छवि और निराली, पाहन के ऊपर हरियाली.

गोदी में खेले रैन -दिवस.
मिट्टी के कण -कण में पियूष.

ग्रीष्म, शीत-पावस का संगम, सुर को यह मोद अगम.
खग बॉस करे तरु- कोटर में, पंकज अह्लाद करे सर में.

अहा!रुचिर यह धरा लोक.
नहीं इससे रमणीक स्वर्ग लोक.

ब्रम्हा ने यह उपकार किया,मानव को यह उपहार दिया.
 मानव बनकर जो आये हैं, निश्चय वो पुण्य कमाए हैं.

जो सदा शुभ व्यवहार किया.
सृष्टि ने उसे दुलार किया.

यह तन मिट्टी के घट समान, चिरस्थायी यह नहीं सामान.
ठोकर लगते फूट जाएगा, फिर मिट्टी में मिल जाएगा.

जो नर दूरदर्शी होता है.
मस्ती में समय न खोता है.

रंगमंच यह इला है,मानव -जीवन एक लीला है.
हर मनुज पात्र बन आते हैं, अभिनय करके दिखलाते हैं.

करता मूल्यांकन इतिहास.
नर -कर्म सदा करता निवास.

पर मनुज- शरीर मिट जाता है,मिट्टी के बीच दब जाता है.
मिथ्या तन पर करना घमंड, यह तो खुराक है काल-तुंड.

यह सुन्दर तन मिट जाता है.
यश-अपयश ही रह जाता है.

जब इस तन को मिट जाना है, मिट्टी में ही मिल जाना है.
तो कर अधर्म क्यों अधम बने, मानव होकर क्यों अश्म बने.

जीवन में धन की महता  क्यI ?
धन से है सुख की समता क्यI  ?

लोभ,मोह,माया का बंधन, जिस  नर को नहीं बाँध सके.
वही बने धरती का नेता, जिसको विपति ना साध सके.

इस दुनिया की चमक यहीं तक,आगे विकट अन्धेरा है.
प्रिय! तुम्हारे कर कमलों में मानसरोवर मेरा है.

गीतकार -सतीश मापतपुरी          

Views: 471

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by satish mapatpuri on June 15, 2011 at 9:08pm
thank u neelamjee
Comment by Neelam Upadhyaya on June 15, 2011 at 9:59am
bahut hi khoobsoorat shabd sanyojan, bhaw prawan rachan hai.  Badhayee swikar kare.
Comment by satish mapatpuri on June 14, 2011 at 11:00pm

अभिन्न गणेशजी,गुरूजी,संजयजी,अरविन्दजी,अभिनवजी एवं शील कुमार जी हौसलाअफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

Comment by Sheel Kumar on June 14, 2011 at 9:59pm
सुदर भाव संयोजन.सब्द संरचना के लिए शुभेच्छाएं
Comment by Abhinav Arun on June 14, 2011 at 8:02pm

atyant sundar aur prabhaavee rachna badhaai

 

Comment by arvind pathak on June 14, 2011 at 5:22pm
सतीश जी ,
बहुत सुंदर चित्रण ....
धन्यवाद ...
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on June 14, 2011 at 11:41am
****सतीश भईया , बहुत बहुत बधाई,*****बहुत ही खुबसूरत ,बेहद खुबसूरत***
Comment by Rash Bihari Ravi on June 13, 2011 at 4:38pm
kamal ki lekhani dil karta hain padhta hi rahun aapki lekhani jadu bikher rahi hain vah khush kar diya aapne

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 13, 2011 at 9:20am

आहा ! बहुत ही खुबसूरत कारीगरी ऐसा लगता है की पत्थर पर बड़े ही खूबसूरती और बारीकी से एक एक कोण की नक्कासी किया गया हो , बेहद खुबसूरत और सरल प्रवाह से युक्त यह गीत बन पड़ा है |

सतीश भईया , बहुत बहुत बधाई स्वीकार कीजिये, कभी कभार ही इस तरह की रचनाएँ पढ़ने को मिलती है |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Friday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Friday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service