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मन तिरता आकाश

 

नैनों में सपने तिरते हैं,

मन तिरता आकाश

देखूं जब भी तेरा मुखड़ा,

लगता खिला पलाश

 

मधुरिम गीत लिख रही मेंहदी,

पायल गाती है

माथे पर कुमकुम की ज्वाला,

तन दहकाती है

 

मावस रात लगे पूनम सी,

ऐसा हुआ प्रकाश  

 

तेरे कदमों की आहट जब,

द्वारे पर आई

मेरे मन के भीतर गूंजी,

मीठी शहनाई

 

तुझे अंक में भर लेने को,

हैं व्याकुल भुजपाश

 

बाकी सारी दुनियादारी,

लगती है फरजी

साथ तुम्हारा रहे हमेशा,

यही एक अरजी

 

प्रतिदिन हो बरसात प्रेम की,

हो न कभी अवकाश

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on February 8, 2019 at 8:28pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on February 8, 2019 at 8:26pm

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमस्कार, आपकी हौसलाअफजाई को सादर नमन 

Comment by Samar kabeer on February 8, 2019 at 3:00pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,अच्छा गीत लिखा आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2019 at 4:53am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । सुंदर गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

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