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मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं ..

2122-2122-2122

वक्त से दो चार हो जाने लगे हैं।।
मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं।।

अब जो अरमानों को टहलाने-लगे* हैं।।(बहाने बाजी करना)
जीस्त की सच्चाई अपनाने लगे हैं।।

उम्र की दस्तक़ जो है चहरे प मेरे।
श्वेत होकर केश लहराने लगे हैं।।

बचपना अब रूठता सा जा रहा है ।
पौढ़पन* अब अक्श दरसाने लगे हैं।।

मंजिलों में जिनके परचम दिख रहे उन।
सब के तर* पे शाल्य* मनमाने लगे हैं।।( निचला हिस्सा, काटें)

आंवा'* जब तपकर किये स्वभाव मटका।(कुम्हार की भट्ठी)
हर तपिश से ..शुक्रिया पाने लगे हैं।।

झूठ के आगे बढा जब सच का चहरा।
कुछ सियासी लोग गुरर्राने लगे हैं।।

लीक से हटकर जरा चलना जो चाहा।
बे-हया हूँ ..... बज्म से तानें लगे हैं।।

सच जरा सा आगे क्या बढ़ने लगा सब।
मरकजों के पैर ....थरर्राने लगे हैं।

अमोद बिंदौरी / मौलिक , अप्रकाशित

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2019 at 2:25pm

आ ब्रजेश भाई साहब ...हृदय से आप का आभार 

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2019 at 2:25pm

आ समर दादा प्रणाम 

प्रोत्साहन और मर्गदर्शन के लिए आभार ...

Comment by Samar kabeer on March 20, 2019 at 3:05pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

शिल्प और व्याकरण पर अभी और अभ्यास की ज़रूरत है,ध्यान दें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 20, 2019 at 1:03pm

वाह खूब ग़ज़ल हुई अमोद जी बधाई

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