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है कहाँ फूल जैसा खिला आदमी

हो गया है ग़मों का किला आदमी

 

मंदिरों, मस्जिदों में रहे ढूँढते  

जब मिला आदमी में मिला आदमी

 

गाँठ दिल में लगी तो खुली ही नहीं

भूल पाया न शिकवा-गिला आदमी

 

भीड़ में जब गया भीड़ का हो गया

बन गया आजकल काफ़िला आदमी

 

दौड़ कर मिल रहा था गले कल तलक

तख्त पाकर कहाँ फिर हिला आदमी

 

सुर्ख़ियों में रहा गुम गया एक दिन

एक चलता हुआ सिलसिला आदमी

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2019 at 11:28am

आदरणीय   vijay nikore जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2019 at 11:28am

आदरणीय  Hardam Singh Maan जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2019 at 11:27am

आदरणीय   dandpani nahak जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2019 at 11:26am

आदरणीय   Anamika singh Ana जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2019 at 11:26am

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार 

Comment by vijay nikore on May 30, 2019 at 10:50am

गज़ल अच्छी लगी। बधाई, मित्र बसंत कुमार जी।

Comment by Hardam Singh Maan on May 26, 2019 at 8:17pm
बहुत खूब
Comment by Anamika singh Ana on May 25, 2019 at 10:26pm

वाह ! उम्दा ग़ज़ल हेतु  सादर बधाई  ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 25, 2019 at 5:42am

आ. भाई बसंत जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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